Friday, 29 December 2017

आस का आँचल




कौन-सा आँगन जहाँ  पर ग़म नहीं
आस का आँचल मगर कुछ कम नहीं

राख में क्यों भूनते हो तल्खियाँ
आज जलवागर अँगारे कम नहीं

रूठकर आँसू बहाना छोड़ दो
दर्द का बेइन्तहा आलम नहीं

मौज दरिया की समन्दर से मिली
उम्र भर की वह रवानी कम नहीं

चाँदनी का नूर भी दिलक़श बहुत
बीत जाए दोपहर कुछ ग़म नहीं

कुछ मुकम्मल मिल गया इस दौड़ में
क्यों समझते हो किसी में दम नहीं

ज़ख्म ताज़ा ही रहे तो क्या कहें
पालते नासूर फिर मरहम नहीं

 2122  2122  212



                  कैलाश नीहारिका

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