Wednesday, 10 October 2018

शज़र के बुलाए हुए

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हम परिन्दे हैं किसी शज़र के बुलाए हुए
पत्तियों की खुशनुमा महक के लुभाए हुए

आँधियों पर  बहस करना अभी मुनासिब नहीं
 चहकने भी दो हमें आसमां उठाए हुए

हम घटाओं का पता पूछने निकल तो गए
आग का गोला चला साथ कहर ढाए हुए

लौटने भर की नहीं आस मिलन की भी रही
सौंपने हैं  आज तक  ख़ास पल बचाए हुए

बतकही करके  ज़हन में उड़ान ताज़ा हुई
जिस्म को राहत नहीं दिन हुए नहाए हुए

दूर तक जाते हुए वापसी बचाना सदा
लौट आना  नीड़ की चाहतें बचाए हुए

                                             कैलाश नीहारिका