Wednesday, 10 October 2018

शज़र के बुलाए हुए

    2122  212  212  122  12

हम परिन्दे हैं किसी शज़र के बुलाए हुए
पत्तियों की खुशनुमा महक के लुभाए हुए

आँधियों पर  बहस करना अभी मुनासिब नहीं
 चहकने भी दो हमें आसमां उठाए हुए

हम घटाओं का पता पूछने निकल तो गए
आग का गोला चला साथ कहर ढाए हुए

लौटने भर की नहीं आस मिलन की भी रही
सौंपने हैं  आज तक  ख़ास पल बचाए हुए

बतकही करके  ज़हन में उड़ान ताज़ा हुई
जिस्म को राहत नहीं दिन हुए नहाए हुए

दूर तक जाते हुए वापसी बचाना सदा
लौट आना  नीड़ की चाहतें बचाए हुए

                                             कैलाश नीहारिका

4 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 10/10/2018 की बुलेटिन, ग़ज़ल सम्राट स्व॰ जगजीत सिंह साहब की ७ वीं पुण्यतिथि “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. ग़ज़ल गायकी के श्रेष्ठ रत्न जगजीत सिंह को सादर नमन.
    मेरी ग़ज़ल को इसमें शामिल करने का स्वागत है। आपका आभार।

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  3. वाह वाह वाह
    ब्लॉग पर ऐसी गजल पढने को नहीं मिलती...
    पधारियेगा हद पार इश्क 

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