Tuesday, 8 August 2017

जश्न की साँझ

बेहुनर हाथ किसी काबिल बना लूँ तो चलूँ
आस की  डोर हथेली में  थमा दूँ तो चलूँ

मोड़ दर मोड़ मिलेंगे जलजले खतरों भरे
एक मुस्कान निगाहों में बसा लूँ तो चलूँ                    

रात-भर नींद करेगी बेवफ़ा-सी बतकही 
जश्न की साँझ अँधेरों से बचा लूँ तो चलूँ 
                               कैलाश नीहारिका

Saturday, 10 June 2017

प्रत्यावर्तन

मैं अक्सर जड़ों को प्यार करने  की चाहत लिए
देखती हूँ अपनी आशीषमयी दृष्टि को
स्पन्दित शाखाओं पर उगते
नवांकुरों को सहलाते हुए !

                                      कैलाश नीहारिका

Tuesday, 24 January 2017

भेड़ों की सँभाल

नहीं चाहिए मुझको
चरवाहे का एकान्त
आता ही नहीं मुझको
भेड़ों के संग रहना
झेलना उनको !
नहीं चाहिए भेड़ों की सँभाल का पारिश्रमिक मुझे
नहीं चाहिए उनकी खाल !

और यह भी सच कि
भेड़ें नहीं चुनतीं हाँके जाना
वे भी जी लेंगी अपने-आप
इतनी बड़ी
परस्पर पोषक सृष्टि में
क्या चाहिए उनको
मेरा नियन्त्रण, संरक्षण !

नहीं चाहिए उनको
मुखिया कोई
चल लेंगी सब गर्दन झुकाए पीछे
कोई एक चलेगी जिधर
वे नहीं जानतीं मतभेद या मनमुटाव
क्यों न जीने दूँ उनको
जैसी हैं वे !

                           कैलाश नीहारिका

Friday, 25 November 2016


उसे अपना लूँ


सूर्यांश 
वह कहीं धूप के टुकड़े-सा
छिटक कर बिखरा 
मैंने  चाहा कि  उसे अपना लूँ
किसी कोने के अँधेरे को लील ही लेगा
वह  दिपदिपाता अंश सूरज का !

Monday, 25 July 2016

प्रेम से दूर

मैं-मैं की टेर लिए
सहचरों के बीच भी
पाखी अकेला
सह नहीं पाता
प्रेम की उपस्थिति
प्रेम का विस्तार
सहसा उड़ जाएगा किसी दिन
प्रेम की अडोल नम्यता से
घृणा करते-करते !

                      कैलाश नीहारिका

Tuesday, 19 July 2016

परिक्रमा से बाहर


वे मनमानी सत्ता के अडोल प्रेमी
निकट होते फुसफुसाते कान में
मधुर गुनगुनाहट में वास्ता देते
किसी प्यारी धरोहर का
धीरे-धीरे फिर टटोलते
कर्तव्य के भ्रमित आत्म बोध को

दिलेर कहाँ दुराग्रही वे
जा ही नहीं पाते
धर्मोन्माद की परिधि से बाहर कभी
अबूझे रास्तों के
अज्ञात मोड़ों से आशंकित
घूमते रहेंगे गोल-गोल
चक्रव्यूह रचते हुए
काँपते हैं
परिक्रमा से बाहर होने के जोख़िम सोचकर !

                         कैलाश नीहारिका