Saturday, 10 June 2017

प्रत्यावर्तन

मैं अक्सर जड़ों को प्यार करने  की चाहत में
देखती हूँ अपने हाथों को
नवांकुरों को सहलाते हुए !

                                      कैलाश नीहारिका

Tuesday, 24 January 2017

भेड़ों की सँभाल

नहीं चाहिए मुझको
चरवाहे का एकान्त
आता ही नहीं मुझको
भेड़ों के संग रहना
झेलना उनको !
नहीं चाहिए भेड़ों की सँभाल का पारिश्रमिक मुझे
नहीं चाहिए उनकी खाल !

और यह भी सच कि
भेड़ें नहीं चुनती हाँके जाना
वे भी जी लेंगी स्वतः
इतनी बड़ी परस्पर पोषक सृष्टि में
नहीं चाहिए उनको
मेरा नियन्त्रण, संरक्षण !

                                        कैलाश नीहारिका

Friday, 25 November 2016


उसे अपना लूँ


सूर्यांश 
वह कहीं धूप के टुकड़े-सा
छिटक कर बिखरा 
मैंने  चाहा कि  उसे अपना लूँ
किसी कोने के अँधेरे को लील ही लेगा
वह  दिपदिपाता अंश सूरज का !

Monday, 25 July 2016

प्रेम से दूर

मैं-मैं की टेर लिए
सहचरों के बीच भी
पाखी अकेला
सह नहीं पाता
प्रेम की उपस्थिति
प्रेम की व्यापकता
सहसा उड़ जाए किसी दिन
घृणा करते-करते
प्रेम की  अडोल नम्यता से !

                      कैलाश नीहारिका

Tuesday, 19 July 2016

परिक्रमा से बाहर


अबूझे रास्तों के
अज्ञात मोड़ों से आशंकित
घूमते रहे गोल-गोल
जा ही न सके
परिधि से बाहर कभी

परिक्रमा से
बाहर होने का जोख़िम
प्रायः डराता  रहा !


                   कैलाश नीहारिका 

Thursday, 5 May 2016

संचित विष

दंश की  सम्भावनाओं को
कुचला मसला
कर दिया निर्मूल
फिर भी 
बच नहीं पाए
विष से
खदबदाता था जो भीतर
चिरपोषित
अमूल्य धरोहर-सा संचित !

                        कैलाश नीहारिका