Tuesday, 24 January 2017

भेड़ों की सँभाल

नहीं चाहिए मुझको
चरवाहे का एकान्त
आता ही नहीं मुझको
भेड़ों के संग रहना
झेलना उनको !
नहीं चाहिए भेड़ों की सँभाल का पारिश्रमिक मुझे
नहीं चाहिए उनकी खाल !

और यह भी सच कि
भेड़ें नहीं चुनती हाँके जाना
वे भी जी लेंगी स्वतः
इतनी बड़ी परस्पर पोषक सृष्टि में
नहीं चाहिए उनको
मेरा नियन्त्रण, संरक्षण !

                                        कैलाश नीहारिका

Friday, 25 November 2016


अपना लूँ


सूर्यांश 
वह कहीं धूप के टुकड़े-सा
छिटक कर बिखरा 
मैंने  चाहा कि  उसे अपना लूँ
किसी कोने के अँधेरे को लील ही लेगा
वह  दिपदिपाता अंश सूरज का !

Monday, 25 July 2016

प्रेम से दूर

मैं-मैं की टेर लिए
सहचरों के बीच भी
पाखी अकेला
सह नहीं पाता
प्रेम की उपस्थिति
प्रेम की व्यापकता
सहसा उड़ जाए किसी दिन
घृणा करते-करते प्रेम की  नम्यता से !

                      कैलाश नीहारिका

Tuesday, 19 July 2016

परिक्रमा से बाहर


अबूझे रास्तों के
अज्ञात मोड़ों से आशंकित
घूमते रहे गोल-गोल
जा ही न सके
परिधि से बाहर कभी
प्रायः डराता ही रहा
परिक्रमा से
बाहर होने का जोख़िम !


                   कैलाश नीहारिका 

Thursday, 5 May 2016

संचित विष

दंश की  सम्भावनाओं को
कुचला मसला
कर दिया निर्मूल
फिर भी 
बच नहीं पाए
विष से
खदबदाता था जो भीतर
चिरपोषित
अमूल्य धरोहर-सा संचित !

                        कैलाश नीहारिका

Friday, 29 April 2016

डिज़ाइन

क्यों सखी
ऊन के गोलों में ही उलझी हो अभी
या नींव के डिज़ाइन भी
सोचने लगी हो
उमस भरी जलवायु अथवा
बिखरे कणों की मिट्टी के मद्देनज़र !

कैलाश नीहारिका