Monday, 11 December 2017

बहुत दरारें हैं

  212 212 1222

कौन-सा धर्म और थाती है 
सोचकर खूब लाज आती है

हौसलों में बहुत दरारें हैं            
ईंट-दर-ईंट थरथराती है

नफरतों के उजाड़ जंगल में
प्रेम की पौध सूख जाती है

उछल कर जो गिरी किनारों पे
ताप से छींट सूख जाती है

मान लो चाह-भर इरादे हैं
हर कदम बात बदल जाती है

वे बजाते रहे थकी ताली 
ऊँघती आँख छलक जाती है

             कैलाश नीहारिका 

Saturday, 9 December 2017

तेरे मेरे बीच

    2122 222 2221
    
इक तबस्सुम है तेरे-मेरे बीच
राह रौशन है तेरे-मेरे बीच

हमख़याली की राहें रचतीं कशिश 
इक सुकूं रहता तेरे-मेरे बीच

साथ तो लोग चला करते हैं रोज़
गुफ़्तगू चलती तेरे-मेरे बीच

शाम-भर ज़िन्दा बतकहियों का सबब          
रंग लाया है तेरे-मेरे बीच

दूर जाते ही दिन लगता बेनूर 
ये  नया मसला तेरे-मेरे बीच

लौटकर आने तक रहना मौजूद
हौसला-भर है तेरे-मेरे बीच 
          
                   कैलाश नीहारिका 

Wednesday, 6 December 2017

तेरा होना


जाने कब कौन हो निशाने पे
किसका अहसान है ज़माने पे 

तेरा होना जिसे समझ आया          
कब वो तन्हा रहा ज़माने में

चुप तो रहते रहे बिना सोचे
जिसने सोचा कहा जमाने से

चाहे वह आस-पास रहता हो
ख़ासा दुश्वार पास आने में

हमने चाहा अगर ख़ुशी बोएं
खुशियाँ भूले उसे रिझाने में 

जिसने पायी तपिश गले मिलकर
उसकी चाहत दिखी  निशाने पे

कैलाश नीहारिका




Friday, 1 December 2017

जश्न की साँझ

 
बेहुनर हाथ किसी काबिल बना दूँ  तो चलूँ
आस की  डोर हथेली में  थमा दूँ तो चलूँ

मोड़ दर मोड़ मिलेंगे जलजले खतरों भरे
एक मुस्कान निगाहों में बसा लूँ तो चलूँ                    

रात-भर नींद करेगी बेवफ़ा-सी बतकही 
जश्न की साँझ अँधेरों से बचा लूँ तो चलूँ

पाँव नाज़ुक उलझ गए हैं नुकीली राह से 
अजनबी राह इसे अपनी बना लूँ तो चलूँ 

डगर को छोड़ कहाँ जाऊँ भला तुम ही कहो
चाँद की चाह समन्दर को बतादूँ तो चलूँ

                               कैलाश नीहारिका 

Saturday, 10 June 2017

प्रत्यावर्तन



धड़कती शाखाओं पर
उगते नवांकुरों को सहलाती है जब
असीसती निगाह मेरी
तो देखती हूँ अक्सर
जड़ों को प्यार करने की अपनी कुव्वत को !

                          कैलाश नीहारिका 

Tuesday, 24 January 2017

भेड़ों की सँभाल

नहीं चाहिए मुझको
चरवाहे का एकान्त
आता ही नहीं मुझको
भेड़ों के संग रहना
झेलना उनको !
नहीं चाहिए भेड़ों की सँभाल का पारिश्रमिक मुझे
नहीं चाहिए उनकी खाल !

और यह भी सच कि
भेड़ें नहीं चुनतीं हाँके जाना
वे भी जी लेंगी अपने-आप
इतनी बड़ी
परस्पर पोषक सृष्टि में
क्या चाहिए उनको
मेरा नियन्त्रण, संरक्षण !

नहीं चाहिए उनको
मुखिया कोई
चल लेंगी सब गर्दन झुकाए पीछे
कोई एक चलेगी जिधर
वे नहीं जानतीं मतभेद या मनमुटाव
क्यों न जीने दूँ उनको
जैसी हैं वे !

                           कैलाश नीहारिका

Friday, 25 November 2016

उसे अपना लूँ


सूर्यांश 
वह कहीं धूप के टुकड़े-सा छिटक कर बिखरा 
मैंने  चाहा कि  उसे अपना लूँ
किसी कोने के अँधेरे को लील ही लेगा
वह  दिपदिपाता अंश सूरज का !

                            कैलाश नीहारिका