Friday, 9 February 2018

परिंदों को बुला लेते हैं

 

  ओढ़ के धूप हमें ठण्डी हवा देते हैं   
  पेड़ खामोश सदा माँ-सी दुआ देते हैं 

  साँस-दर-साँस निभाएं खूब रिश्ते अपने
  ये बिना शर्त परिंदों को बुला लेते हैं 


  परत-दर-परत सहेजें सब निशां चोटों के
  आह भरते कि नई  शाखें  उगा लेते हैं 


  ख़ास अंदाज़ लिए झूमें कभी मस्ती में
  ओढ़ते रूप कि मौसम का पता देते हैं   

  दिन कहीं रात कहीं ऐसे मुसाफिर भी हैं                  
  राह-भर जोश जुटाते ये विदा देते हैं 
     
                       कैलाश नीहारिका               
   212 2222 212  222


Tuesday, 16 January 2018

क्यों चल दिए

कह नहीं पाते कभी  क्यों चल दिए
रुक सकोगे क्या अभी क्यों चल दिए

रात-भर दीये जले खामोश ही
सुबह चहकी भी नहीं क्यों चल दिए

बात  सहने का ज़माना लद गया
आप यूँ  बिन कुछ कहे क्यों चल दिए

आहटों की गूँज-भर बाकी रही
सब दरीचे बंदकर क्यों चल दिए

खो गई सरगम हमेशा टेरती
चार दिन वंशी सुना क्यों चल दिए

होंठ हिलते देखते अरदास के
साथ ही चलते अभी क्यों चल दिए

    212  2212  2212               
                       कैलाश नीहारिका

Sunday, 7 January 2018

तत्पर हथेलियाँ


बात करते-करते
संग-सम्बन्धों के विमर्श पर  
मौन ओढ़ लेते हो अनमने-से !
देखते नहीं
एक-से रहते नहीं सदा
मुट्ठियों में कसे-सटे रेशे आसक्तियों के !

देखो कि आगे बढ़े हाथ को
यूँ ही नहीं थाम लेतीं
तत्पर हथेलियाँ
मन की तहों में
दबे अदीठ गोपन
ऐसे ही रेशमी फिसलन-से नहीं खुल जाते
कोई बेवजह नहीं सँजोता
टेरती कशिश निगाहों में !

जंगल में नाचने से पहले
आकुल हो मोर जोहता नहीं अकारण
अखुट्ट भरोसा सहचर का !

यात्रा कोई शुरू होती नहीं अधर से
बिना पृष्ठभूमि के
सोचो तो, ऐसा भी जटिल नहीं
पाँव और डगर के सम्बन्धों की टोह लेना !

                    कैलाश नीहारिका 




                             
      

Tuesday, 2 January 2018

पीछे मुड़कर भी देखना



पायल, बिन्दी, कँगना से 
आगे निकल चुकी लड़की
पीछे मुड़कर भी देखना
चीन्हना उस साम्राज्य को
जहाँ गृह-कारा में बंद कई ज़िन्दा अस्तित्व और 
विवशता के रुदन में दब गए मनभावन गीत
अजगरी जकड़न की वेदना से त्रस्त हैं  !

दोहराऊँगी आह्वान कि बेगार मत ढोना 
किसी गन्तव्यहीन यात्रा की
बहुत-से पिंजरे हटाने हैं तुम्हें
जिनसे तुम मुक्त हो !
कुछ दबे गीतों के सुर भी  
दूर तक चल देंगे
पकड़ उंगली तुम्हारी
जो अभी असमंजस में हैं
होंठों की देहरी के भीतर !

तुम देखना मुड़कर 
कि अवरुद्ध साँसों को कुछ साफ़ हवा मिल सके 
कि सुन्न पंखों में जागें स्पन्दन 
कि फैसलों के पीछे हों कई पुख़्ता कदम 
कि शोर की जगह संगीत ले !
 
मैं मिलूँगी तुम्हें प्रतीक्षारत 
इसी मोड़ पर
हठी गान्धारी की आँखों पर से 
अनदिखी पट्टियाँ खोलते  
दुखती उँगलियों से !

                  कैलाश नीहारिका

Saturday, 30 December 2017

कविता की बात

उन्होंने कहा / कर्म से बदलेगी दुनिया / कविता से नहीं
मैंने खोजबीन की / कर्मवीर से मिली / देखा उसका कर्म
बातचीत की / चकित रह गई
बातें उसकी कविता ही थीं !

                           कैलाश नीहारिका    

Friday, 29 December 2017

आस का आँचल




कौन-सा आँगन जहाँ  पर ग़म नहीं
आस का आँचल कभी भी कम नहीं

राख में क्यों भूनते हो तल्खियाँ
आज जलवागर अँगारे कम नहीं

रूठकर आँसू बहाना छोड़ दो
दर्द का बेइन्तहा आलम नहीं

मौज दरिया की समन्दर से मिली
उम्र भर की वह रवानी कम नहीं

चाँदनी का नूर भी दिलक़श बहुत
बीत जाए दोपहर कुछ ग़म नहीं

कुछ मुकम्मल मिल गया इस दौड़ में
क्यों समझते हो किसी में दम नहीं

ज़ख्म ताज़ा ही रहे तो क्या कहें
पालते नासूर फिर मरहम नहीं 

 2122  2122  212



                  कैलाश नीहारिका