Friday, 21 June 2019

तृप्ति



शब्द बहते नहीं, तैरते हैं
इसी तैराकी के अभ्यास में
उन्हें पुष्ट  होते देख
मैं तृप्त होती हूँ ।
      

Monday, 17 June 2019

पगडण्डियों के छलावे

जंगलों की कच्ची गन्ध सहेजते
शिराओं-सी पगडण्डियाँ
मोहक लगती हैं मुझे
पहुँचते हैं पथिक ठौर पर
पगडण्डियाँ नहीं पहुँचतीं
आश्वस्त नहीं हूँ पगडण्डियों के छलावे से
कि वे जोड़ती हैं ठौर से
मैं अपने क़दमों की ऊर्जा को
सहलाती हूँ
मुझे प्यार है चलते रहने से !
                                     कैलाश नीहारिका

Thursday, 23 May 2019

सींग-प्रेम


क्यों न हम पाल ले सींग
किसी भी तरकीब से
नित्य करें पुष्ट और पैना उन्हें
वही हैं अभी हमारी मनभावन
धारदार अभिव्यक्ति और सृजन के उपकरण !

खूब समझते हैं हम
लोकतंत्र की वाणी से अपनी दूरी
दशकों तक फैली हो वह दूरी या
संभव  है कि हमारा सींग-प्रेम
सदियों तक फैला दे उसी  दूरी को !

नफ़रत और उपेक्षा भरी  लाल-लाल आँखों से
घूरते कभी ताकते
सुनते रहेंगे हम न्याय विमर्शों को
सत्ता के उन्माद अथवा वञ्चना में
सींग चमकाते हुए 
खोजते रहेंगे कोई पीठ
खुजलाने को
कोई ओट
लार और शौच टपकाने को !

                            कैलाश  नीहारिका



Friday, 25 January 2019

छतरियाँ थामे

          212  22  122  212   221

छतरियां थामे चले वे माँगते बरसात
मैं चली शबनम सहेजे साथ में आकाश

धूप ने मुट्ठी भरी  सौंपे शज़र को रंग
मंच पर कब तक सुनाती ज़िंदगी संवाद

खोजकर पाताल-भर रचते कहीं तो झील
राह में  अन्धा कुआँ किस तरह सीँचूँ आस            

क्यों तिज़ारत घोल देते चाहतों के संग   
रंग  कुदरत के सहेजूँ  और खेलूँ  फाग

वे परिन्दों को बुलाकर निरखते परवाज़
पर मुझे उनका चहकना सौंपता इक नाद

वह समन्दर या कि सहरा सिरजता हो रास
लहरियाँ बस प्रेम की जी को करें आबाद
       
 कैलाश नीहारिका