Saturday, 19 July 2014

पुर्जा


कहो  लोकतन्त्र
मेरे कन्धों पर कमानियाँ कसकर
मुझे इस तन्त्र का पुर्जा बनाने का दुराग्रह   
तुम्हारे अस्तित्व के लिए 
अपरिहार्य क्यों  है ?
सुनो, सत्ता के बहुरूपियों की कतार में
शामिल नहीं हूँ मैं !
 
और भी ...…
मेरी  मस्तिष्क- तन्त्रियों से
जोड़कर मशीनी संवेदक
मुझे निर्देश देने की हिमाकत
किसकी  चक्रव्यूही बेहूदगी  है ?
कड़ी-दर-कड़ी  इस शिकंजे की गिरफ़्त से
 ऐंठता है संवेदन-तन्त्र
और अस्थियाँ भी !

सुनो
बाज़ार के, सत्ता के पैरोकार  बहुरूपियो !
निर्बाध जीविका के वास्ते
और संतति के सुनहरे भविष्य की खातिर
अथवा ढलती जीवनावधि की
सुरक्षा के प्रलोभन बिछाते
मुझे पुर्जा-दर-पुर्जा रोबोट बनाने की कोशिश बेजा है , छोड़ो !

व्यक्ति हूँ मैं, जिसमें रूह भी है
जिसे सम्प्रदाय, जाति, लिंग, भाषा, स्थान से परे भी
बहुत कुछ झँझोड़ता है

और वे किस कालखण्ड के तुम्हारे पुरखे थे
जो आदमी को आदमी की दवा मानते थे
अचूक ! अतुल्य !

                                     कैलाश नीहारिका

Tuesday, 1 July 2014

लील गया गुनगुनाहट

घुमड़ आए बादल
नाचने लगे मयूर
अवाक रह गई
दिनों से कुहकती कोयल !

सद्य:स्नात जंगल में
पसरने लगीं
भीनी-भीनी सुरभियाँ
झूम उठी उत्सव-धर्मी प्रकृति !

झाँकती कहीं से  विरल-सी कोई सूर्य-किरण
निरायास ही आलोकित कर गई
हवाओं में अटकी एक बूँद को
छा गई गगन में
मृदुल रंगों की एक चाप अद्भुत  ! 

तभी कहीं पास ही
गीले ईंधन से उठता सघन धुआँ
लील गया झटपट
किसी सहज गुनगुनाहट को !

                 कैलाश नीहारिका