Saturday, 19 July 2014

पुर्जा


सुनो लोकतन्त्र
तुम्हारे अस्तित्व का संकट 
अजब भामक है
किस-किस को साधोगे
एक रस्सीनाच तो नहीं यहाँ !
देखो तो यह दुराग्रह
मेरे कन्धों पर कमानियाँ कसकर
मुझे इस तन्त्र का पुर्जा बनाना
इतना अपरिहार्य क्यों  है  
सत्ता के इच्छुकों की कतार में नहीं हूँ मैं !
 
और भी ...…
मेरी  मस्तिष्क- तन्त्रियों से
जोड़कर मशीनी संवेदक
मुझे निर्देश देने की हिमाकत
किसकी चक्रव्यूही बेहूदगी  है ?
कड़ी-दर-कड़ी इस शिकंजे की गिरफ़्त से
ऐंठता है संवेदन-तन्त्र
और अस्थियाँ भी !

सुनो
बाज़ार के, सत्ता के पैरोकार बहुरूपियो !
निर्बाध जीविका की खातिर
और संतति के सुनहरे भविष्य के लिए
या ढलती उम्र की
सुरक्षा तय करते
पुर्जा-दर-पुर्जा मुझे रोबोट बनाने की कोशिश बेजा है, छोड़ो !

व्यक्ति हूँ मैं, जिसमें रूह भी है
जिसे सम्प्रदाय, जाति, लिंग, भाषा, स्थान से परे भी
बहुत कुछ झँझोड़ता है

और वे किस कालखण्ड के पुरखे थे
जो आदमी को आदमी की दवा मानते थे
अचूक ! अतुल्य !

                                     कैलाश नीहारिका

4 Comments:

At 20 July 2014 at 10:38 , Blogger ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, ४५ साल का हुआ वो 'छोटा' सा 'बड़ा' कदम - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

 
At 20 July 2014 at 16:27 , Blogger Smita Singh said...

बहुत ही प्रेरक। क्या बात है आपकी रचना में जो मन को भीतर तक महसूस हो गई। वाह

 
At 21 July 2014 at 08:58 , Blogger सुशील कुमार जोशी said...

वाह ।

 
At 25 July 2014 at 14:14 , Blogger आशा जोगळेकर said...

व्यक्ति हूँ मैं, जिसमें रूह भी है
जिसे सम्प्रदाय, जाति, लिंग,भाषा, स्थान से परे भी
बहुत कुछ झँझोड़ता है

सच।

 

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