Wednesday, 27 August 2014

वह शहर का बाशिन्दा

      2212  222  1222  1221

वह शहर का बाशिन्दा सही भूला नहीं गाँव             
यह ख्वाहिशों का जंगल परिन्दे को मिली ठाँव

सामान सारा  लेते  हुए छूटा  कुछ  ज़रूर
वह  देखता है अक्सर कहीं दूर उजड़ी ठाँव

रस्साकशी की थकन फिर झुलसाती कड़ी धूप  
अब कौन लौटाए नीम-बरगद की घनी छाँव

वे खोजती-सी नज़रें किसी छत से कहीं दूर
पहुँचा कभी जो शहर फिर लौटा ही नहीं गाँव

अब नापता आकाश  उड़ता  पहियों पर सवार
 बस याद-भर में दुखते रहे   सूजे  थके पाँव

                        कैलाश नीहारिका

Thursday, 14 August 2014

चौकन्ने शिकारी

क्या है कि मुझे अक्सर
सुनना फिर सोचना  है
एक सरोकार मेरे कन्धों पर सवार सदा--
' बचके रहना ' ! ' बचके रहना ' !

जुबानें शरबती
निगाहें मखमली
इरादे नश्तरी !

ये बेआवाज़ अट्टहास करते
मचान बाँधते
चौकन्ने शिकारी मोर्चे सँभालते
बिना सींग, बिना पूँछ, अदीख पंजों से आश्वस्त !

सहजात वासियों की बस्तियों में
फैलाते निरन्तर 
धुँआ ज़हरीला दमघोंटू
सदा गढ़ता आकृतियाँ खतरनाक !

हवाओं में सरसराती सिरचढ़ी-सी फुसफुसाहट
तैरती है दूर तक आजकल ---------
' बचना राधा-वल्लभ ! बचके रहना कनुप्रिया !'

                                          कैलाश नीहारिका



Wednesday, 13 August 2014

यायावरी




पहाड़ यूँ ही नहीं
घिसते, दरकते, बिखरते
तेज हवाएँ, बर्फीले प्रवाह
बिजलियों भरे तूफानी अंधड़----
इन सबको झेलते
और कभी किसी उल्कापिण्ड की
बौखलाई, बुझी चमक से भ्रमित- भौचक्क पहाड़
खोलते हैं अपनी बन्द मुट्ठियाँ
शिराओं की समस्त सनसनाहट को
झेलती मुट्ठियाँ !

पहाड़ों की खुलती मुट्ठियों से
झरते-झरते रेत
कुछ बखानती-सी  उतावली
शिखर से उमड़ता जल
दौड़ता आश्वस्त करते
बढ़ता निर्बाध
सहयात्रा का खुला आमन्त्रण फहराते !

जल की यात्रा के समान्तर
रेत साथ है यायावर-सी
जाने कब से ……कब तक
शाश्वत साक्षी

यह रेत बह जाएगी दूर तक
घुल न पाएगी, निथर जाएगा जल
इसके कण-कण में नमी के किस्से होंगे
भले ही यह रेत सूख जाएगी !

                       कैलाश नीहारिका

Saturday, 2 August 2014

हक़ जताते हैं

       212 2222  2121  222
चन्द फूलों का सरमाया कि हक़ जताते हैं
क्यों हवा पानी धरती धूप भूल जाते हैं            

दूर तक देखा तो  बेपीर चेहरे देखे
बाँटकर टुकड़ों में आकाश मुस्कराते हैं

क़त्ल करते हैं वे मासूमियत सदा ओढ़े
किस दिलेरी से ऐसी फब्तियाँ सुनाते हैं

आपने देखा तो होगा कहीं मुकम्मल घर
एक-दूजे  की खुशियों को गले लगाते हैं

पेड़ की छाया भी उनकी वसंत भी उनका 
धूप-बरसातों में जो  साथ गुनगुनाते हैं

                        कैलाश नीहारिका