Monday, 25 July 2016

प्रेम से दूर

मैं-मैं की टेर लिए
सहचरों के बीच भी
पाखी अकेला
सह नहीं पाता
प्रेम की उपस्थिति
प्रेम का विस्तार
सहसा उड़ जाएगा किसी दिन
प्रेम की अडोल नम्यता से
घृणा करते-करते !

                      कैलाश नीहारिका

Tuesday, 19 July 2016

परिक्रमा से बाहर


वे मनमानी सत्ता के अडोल प्रेमी
निकट होते फुसफुसाते कान में
मधुर गुनगुनाहट में वास्ता देते
किसी प्यारी धरोहर का
धीरे-धीरे फिर टटोलते
कर्तव्य के भ्रमित आत्म बोध को

दिलेर कहाँ दुराग्रही वे
जा ही नहीं पाते
धर्मोन्माद की परिधि से बाहर कभी
अबूझे रास्तों के
अज्ञात मोड़ों से आशंकित
घूमते रहेंगे गोल-गोल
चक्रव्यूह रचते हुए
काँपते हैं
परिक्रमा से बाहर होने के जोख़िम सोचकर !

                         कैलाश नीहारिका