Wednesday, 13 August 2014

नमी के किस्से




पहाड़ यूँ ही नहीं घिसते, दरकते, बिखरते
तेज हवाएँ, बर्फीले प्रवाह,  बिजलियों भरे तूफानी अंधड़
इन सबको झेलते
और कभी किसी उल्कापिण्ड की
बौखलाई, बुझी चमक से भ्रमित- भौचक्क पहाड़
खोलते हैं अपनी बन्द मुट्ठियाँ
शिराओं की समस्त सनसनाहट को
झेलती मुट्ठियाँ !

पहाड़ों की खुलती मुट्ठियों से
झरते-झरते रेत
कुछ बखानती-सी  उतावली
शिखर से उमड़ता जल
आश्वस्त करते दौड़ता 
सहयात्रा का खुला आमन्त्रण थमाते
बढ़ता निर्बाध !

जल की यात्रा के समान्तर
साथ हूँ यायावर-सी
जाने कब से ……कब तक
साक्षी हूँ--

यह रेत बह जाएगी दूर तक
घुल न पाएगी, निथर जाएगा जल
इसके कण-कण में  नमी के किस्से होंगे
भले ही यह रेत सूख जाएगी !

                             कैलाश नीहारिका

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