Friday, 5 June 2015

कुछ बेसबब कहा होता


दरो-दीवार  सब  ढहा  होता 
कभी तो आसमां जीया होता

सँभल के यूँ नपा-तुला कहना
कभी कुछ  बेसबब कहा होता 

कहा  हँसते हुए  सरे-ख़ल्क़त 
नज़र-भर रीझ के  कहा होता

उसे  मालूम  आग की  शिद्दत
हसरतों का धुआँ  सहा  होता 

फ़िदा होना ग़ज़ब सही लेकिन
कभी  वो मुंतज़िर  रहा  होता

नज़र की बाँक पर लुढ़कता-सा
दिपदिपाता गुहर  सजा होता

छुपा  ही  वो  रहा  खुदाई में
कभी  तो  रूबरू   रहा    होता

                 कैलाश नीहारिका  

2 Comments:

At 13 June 2015 at 23:33 , Blogger dj said...

छिपा ही वो रहा खुदाई में
कभी तो रूबरू रहा होता
बहुत खूब आदरणीया

 
At 25 June 2015 at 11:34 , Blogger कैलाश नीहारिका said...

shukriya dj !

 

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