Tuesday, 23 June 2015

इस पार हम रहे


     किसके ये तीर-तरकश गुनहगार हम रहे
     कहने को तलबगार पर इस पार हम रहे

     सतरंगे  ख्वाब ज़हन  में  किरदार-से बसे 
     वहशत का  दौर देखके  बेज़ार  हम  रहे
 
     जाने  बेइख्तियार आँसू  किस तरह  थमे
     दरिया बहुत  पुरजोश था लाचार हम  रहे

     ये शज़र सदाबहार इनका राज़ क्या कहें
     तन्हा-सी एक झील का किरदार हम रहे

     दीवानापन कि रिंदगी हम कब समझ सके 
     पुरजश्न  लहरें  लेकिन  खबरदार  हम  रहे

                                        कैलाश नीहारिका 

3 Comments:

At 24 June 2015 at 06:46 , Blogger ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, जीना सब को नहीं आता - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

 
At 24 June 2015 at 22:32 , Blogger सुशील कुमार जोशी said...

बढ़िया ।

 
At 25 June 2015 at 00:38 , Blogger सु-मन (Suman Kapoor) said...

बहुत खूब

 

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