Tuesday, 9 June 2015

ख़ुशी सौंपी नहीं

रोशनी सब जगह तो  पहुँची नहीं
महज़  वादों  ने  ख़ुशी  सौंपी  नहीं

किस तरह  नग़में  हवाओं के सुनें
सिर्फ़ तहख़ाने  वहाँ  खिड़की  नहीं

अश्क़ कब तक ठहरते पलकों तले
क्यों  हवाओं में नमी बिखरी  नहीं

साथ  होना  एक  जादू-सा  लगे
साथ न हो तो ख़ुशी टिकती नहीं

खूब लिपटी आहटों से जुस्तजू
आसमां से नींद फिर उतरी नहीं

                       कैलाश नीहारिका

2 Comments:

At 13 June 2015 at 23:32 , Blogger dj said...

बहुत सुन्दर आदरणीया

 
At 14 July 2015 at 04:03 , Blogger कैलाश नीहारिका said...

धन्यवाद dear dj !

 

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