Friday, 20 December 2013

खामोश फैसले

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यहाँ आकाश-भर नारे गुँजाए जाते हैं     
वहाँ खामोश फैसले सुनाए जाते हैं  

पिलाए ज़हर ही सुकरात को दरबार यहाँ 
मसीहा आज भी सूली चढ़ाए जाते हैं

फ़रेबी अश् क़ातिल भी बहाए मय्यत पर       
जनाज़े क्यों क़त्ल करके सजाए जाते हैं

बहुत बेसब्र घड़ियाँ हिज्र की काटे  कटें 
कभी फिर वस्ल से दामन बचाए जाते हैं

फ़ना के बाद जाने क्या उधर अंजाम हुआ
इधर आँखों भरे दरिया सुखाए जाते हैं
       
                          कैलाश नीहारिका

       

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