Saturday, 14 December 2013

तेरा ख़याल

बारहा जोड़ देता सबसे  मुझे  तेरा  ख़याल                      
फिर कहीं करता अलहदा भी मुझे तेरा ख़याल

बरसते मेघ-सा या बहता हुआ  झरना कमाल
घुमड़ते कोहरे-सा  ढकता मुझे  तेरा ख़याल

अजनबी राह पे  बेखौफो-ख़तर वो  शहसवार
दूर  तन्हाइयों  से  करता मुझे  तेरा ख़याल

ठूँठ से फूटती कोंपल  के करिश्मे  का नज़ीर
किस हक़ीक़ी महक से भरता मुझे तेरा ख़याल

कब  कुहुकती सुरीली कोयल  मुँडेरों पे अज़ीज़ 
इक चमन की फ़िज़ा-सा रचता मुझे तेरा ख़याल

                                            कैलाश नीहारिका
                         ( ' समर ' पत्रिका में प्रकाशित )

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