Thursday, 9 January 2014

सँभालें अब तो


   2122  2122  2122  22

ये छतें दरकी हुईं क्यों ना सँभालें अब तो
मौत के मुँह से अज़ीज़ों को बचालें अब तो 

जिस्म  अधनंगे  छटपटाते  रहे ज़ख्म लिए 
पौंछ ज़ख्मों को  दवा-मरहम लगादें अब तो

फूल-फल, खुशबू  छिपे इनमें, घना साया भी
दूर तक बंजर ज़मीं  पुरनम बना लें अब तो

बस्तियाँ आजकल क्यों दिखने लगीं खौफ़ज़दा
साँप ज़हरीले छिपे  घर में, निकालें  अब तो

क्यों चुराए नज़र चारागर मुकर जाए क्यों   
दम लगाके बन्द दरवाज़े हिलादें अब तो

                       कैलाश नीहारिका

                                     


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