Thursday, 9 January 2014

छत दरकने लगी


जो छत  दरकने  लगी  उसको सँभालें अब तो
मौत के  मुँह  से अज़ीज़ों को  बचालें अब तो

जिस्म  अधनंगे  छटपटाते  रहे ज़ख्म लिए 
पौंछ ज़ख्मों को  दवा-मरहम  लगादें अब  तो

फूल-फल, खुशबू  छिपे इनमें, घना साया भी
अगर बंजर है ज़मीं  पुरनम बना लें  अब तो

बस्तियाँ आजकल क्यों दिखने लगीं खौफ़ज़दा
साँप ज़हरीले छिपे  घर में, निकालें  अब तो

क्यों चुराए नज़र चारागर  मुकर जाए  क्यों   
बन्द  दरवाज़े  सही नीवें हिला दें  अब तो

                       कैलाश नीहारिका

                                     


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