Sunday, 27 May 2018

पेच कई हैं


हर इक से मुँह मोड़ा होगा 
कैसे सब कुछ छोड़ा होगा

भीतर क्या कुछ टूटा होगा
जाने क्या-क्या जोड़ा होगा

मार उसी के हिस्से आई
जिसने भंड़ा फोड़ा होगा

आज भले वह हार गया हो
कल रस्ते का रोड़ा होगा

क्या कुछ अखबारों में छपता 
तीर अजब ही छोड़ा होगा

तुम कहदो तो समझ सकेंगे
कैसे दलबल जोड़ा होगा

इस किस्से में पेच कई हैं
उनके हाथ हथौड़ा होगा
 
     222 222 22
          कैलाश नीहारिका

10 comments:

  1. सुंदर रचना।
    हर इक से मुँह मोड़ा होगा
    कैसे सब कुछ छोड़ा होगा

    भीतर क्या कुछ टूटा होगा
    जाने क्या-क्या जोड़ा होगा

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    1. शुक्रिया पुरुषोत्तम जी .

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  2. बेहद हृदयस्पर्शी रचना | हर पंक्ति लाजवाब है आदरणीया |पहले तो मुझे आपके ब्लॉग का नाम ही बहुत शानदार लगा | हार्दिक शुभकामनाएं आपको |

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    1. तहे-दिल से शुक्रिया रेणु जी .

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