Wednesday, 12 April 2023

ज़मीनी रहनुमा


अनकहे कह दी मुक़म्मल बात उसने
इस तरह साझे किये जज़्बात उसने

साफगोई सिर्फ़ किस्सों में नहीं थी
की हक़ीकी राजदां-सी बात उसने
 
क्या कहे वादे अधूरे रह गए जो
हस्तियों की देख ली औकात उसने
 
बदगुमां-सी महफ़िलों का दौर हरसू
दर्ज  की अब रहनुमा की छाप उसने
 
मतलबी इस दौर में मजलिस सरीखे
रात-दिन देखे कई हालात उसने

                           कैलाश नीहारिका



Thursday, 12 January 2023

ज़िक्र चिथड़ों का

 

ताकते नूर खिलते मुखड़ों का

कौन बनता मसीहा लिथड़ों का

 

जब चमकते मिलें छुरियाँ-काँटे

कौन मातम मनाए बिछुड़ों का

 

एक गुलज़ार-सा बंगला देखा

और देखा तमाशा उजड़ों का

 

वे भरे पेट चुप मुस्कान लिए

खून मिक़दार जाँचें निचुड़ों का

 

यह लिबासों लदा संसार भला

क्या करें ज़िक्र अब उन चिथड़ों का

 

बस नुमाइश भरी गहमा-गहमी

फ़ैसला कौन बाँचे बिगड़ों का

 

तल्खियां बढ़ गईं जब दामन में

पूछने हाल निकले पिछड़ों का


             -- कैलाश नीहारिका

Wednesday, 19 October 2022

नदी को पार करना


गुरु ने समझाया --
किसी पर रीझकर मत गढ़ना
कर्म बन्धन नये
मेरी उलझन थी कि
भरी जो रीझ भीतर कूट-कूट कर
उसका क्या !
विरक्त पीड़ा से भर कह उठे वे --
तुम नहीं चाहते पुल से नदी को पार करना
मोहभंग की नदी में उतरकर ही मानोगे !

                                   --कैलाश नीहारिका

कोई बात करो

 

कोई बात करो
जो मरहम हो
अनदिखे ज़ख्मों के दौर में ।
 
कोई बात करो
जो वाणी दे
विवश मौन के दौर में ।
 
कोई बात करो
जो आस किरण हो
अन्धे न्याय के दौर में !
 
कोई बात करो
जो थाम ले कसकर
निर्मम अलगाव के दौर में।
 
कोई बात करो 
कि मिल बैठें 
इस भाग-दौड़ के दौर में। 
 
            - कैलाश नीहारिका

सौदागर नहीं थे

सौदाई बने जो सौदागर नहीं थे
शैदाई सही वे पेशावर नहीं थे

जो सच में सिरजते थे उम्दा विरासत
वे बेघर मुसाफिर जोरावर नहीं थे

मामूली रहा जिनका होना यहाँ पर 
वे मज़बूर सनकी कद्दावर नहीं थे

उन्हें भी किसी से मोहब्बत हुई थी
वे अपनी बला के चारागर नहीं थे

कोई क्या समझता नादानी भरी जिद
वे जश्ने चमन के दीदावर नहीं थे
 
                      -- कैलाश नीहारिका

 

पायदानों पर रुकी

 

पायदानों पर रुकी अटकी ग़ज़ल
शोख कंधों पर झुकी लटकी ग़ज़ल

तुम हवाले दे रहे हो खूब पर
आप अपनी बात से हटती ग़ज़ल

रोज़ सपने टालती-सी नींद है
जागने के पाठ को रटती  ग़ज़ल

कुन्द होकर मिट गईं जब तल्खियाँ
ज़िन्दगी की सान क्या चढ़ती ग़ज़ल

आज तक हासिल हुईं रुसवाइयाँ 
 किसलिए दिन रात यूँ खटती ग़ज़ल
                   
                    -- कैलाश नीहारिका

Tuesday, 20 September 2022

जो नहीं है प्रेम

प्रेम सोचते हुए
प्रेम को जीते हुए
प्रेम में रँगा फ़कीर
तिनके-तिनके को सहेजता है झाड़ू में
कि कचरे-सा बुहार सके वह सब
जो नहीं है प्रेम ।

मैंने देखा  
सबने देखा होगा --
हर फ़कीर में रचा-बसा कोई श्रीमन्त
हाँ, वही सामन्त
जो प्रायः मुस्कराता है
जीवन की समस्त क्षुद्रताओं पर।

सोचती हूँ अक्सर
क्यों नहीं स्वीकार कर लेता फ़कीर
नैसर्गिक बहते,उमड़ते प्रेम को
प्रेम की समस्त
खर-पतवार-सी क्षुद्र उपजों के साथ ही !

देखता है एक दिन
चौंक कर फ़कीर
उम्र-भर का अपना काम
प्रेम कहीं रुक गया झील-सा
पा गया विस्तार अहम दूर-दूर तक ।

हारता नहीं फ़कीर
कहता है कभी फुसफुसाते हुए
और कभी डंके की चोट पर कि
सृष्टि में सबसे कठिन काम है
प्रेम का विस्तार !

                             -  कैलाश नीहारिका