अनकहे कह दी मुक़म्मल बात उसने
इस तरह साझे किये जज़्बात उसने
साफगोई सिर्फ़ किस्सों में नहीं थी
की हक़ीकी राजदां-सी बात उसने
हस्तियों की देख ली औकात उसने
दर्ज की अब रहनुमा की छाप उसने
रात-दिन देखे कई हालात उसने
कैलाश नीहारिका
कविता एक ऐसी उपज है जिसकी जड़ें गहरी हैं . कविता के शब्दों से ही अर्थ नहीं झरते,उसके शब्द जिस 'स्पेस' से आवरण युक्त होते हैं, वह 'स्पेस' भी कविता कहता है.कविता को समझने के लिए उसके 'स्पेस ' का मर्म समझना ज़रूरी है . मर्मज्ञ ही हो सकता है कविता का पाठक ! कविता एक दर्द है / हम जो हैं / उससे जुदा होने का दर्द / कविता है _ कैलाश नीहारिका
ताकते नूर खिलते मुखड़ों का
कौन बनता मसीहा लिथड़ों का
जब चमकते मिलें छुरियाँ-काँटे
कौन मातम मनाए बिछुड़ों का
एक गुलज़ार-सा बंगला देखा
और देखा तमाशा उजड़ों का
वे भरे पेट चुप मुस्कान लिए
खून मिक़दार जाँचें निचुड़ों का
यह लिबासों लदा संसार भला
क्या करें ज़िक्र अब उन चिथड़ों का
बस नुमाइश भरी गहमा-गहमी
फ़ैसला कौन बाँचे बिगड़ों का
तल्खियां बढ़ गईं जब दामन में
पूछने हाल निकले पिछड़ों का
गुरु ने समझाया --
किसी पर रीझकर मत गढ़ना
कर्म बन्धन नये
मेरी उलझन थी कि
भरी जो रीझ भीतर कूट-कूट कर
उसका क्या !
विरक्त पीड़ा से भर कह उठे वे --
तुम नहीं चाहते पुल से नदी को पार करना
मोहभंग की नदी में उतरकर ही मानोगे !
--कैलाश नीहारिका
प्रेम सोचते हुए
प्रेम को जीते हुए
प्रेम में रँगा फ़कीर
तिनके-तिनके को सहेजता है झाड़ू में
कि कचरे-सा बुहार सके वह सब
जो नहीं है प्रेम ।
मैंने देखा
सबने देखा होगा --
हर फ़कीर में रचा-बसा कोई श्रीमन्त
हाँ, वही सामन्त
जो प्रायः मुस्कराता है
जीवन की समस्त क्षुद्रताओं पर।
सोचती हूँ अक्सर
क्यों नहीं स्वीकार कर लेता फ़कीर
नैसर्गिक बहते,उमड़ते प्रेम को
प्रेम की समस्त
खर-पतवार-सी क्षुद्र उपजों के साथ ही !
देखता है एक दिन
चौंक कर फ़कीर
उम्र-भर का अपना काम
प्रेम कहीं रुक गया झील-सा
पा गया विस्तार अहम दूर-दूर तक ।
हारता नहीं फ़कीर
कहता है कभी फुसफुसाते हुए
और कभी डंके की चोट पर कि
सृष्टि में सबसे कठिन काम है
प्रेम का विस्तार !
- कैलाश नीहारिका