Thursday, 12 January 2023

ज़िक्र चिथड़ों का

 

ताकते नूर खिलते मुखड़ों का
कौन बनता मसीहा लिथड़ों का
 
इस नुमाइश भरी दुनिया में तुम
मत करो ज़िक्र अब उन चिथड़ों का

एक गुलज़ार-सा बंगला देखा
और देखा तमाशा उजड़ों का

जब चमकते मिलें छुरियाँ-काँटे
कौन मातम मनाए बिछुड़ों का

तल्खियां बढ़ गईं जब दामन में
पूछने हाल निकले पिछड़ों का

वे भरे पेट बस मुस्कान लिए
खून मिक़दार जाँचें निचुड़ों का

यह लिबासों लदा संसार सदा
कौन लेखा करेगा बिगड़ों का

             -- कैलाश नीहारिका

Wednesday, 19 October 2022

नदी को पार करना


गुरु ने समझाया --
किसी पर रीझकर मत गढ़ना
कर्म बन्धन नये
मेरी उलझन थी कि
भरी जो रीझ भीतर कूट-कूट कर
उसका क्या !
विरक्त पीड़ा से भर कह उठे वे --
तुम नहीं चाहते पुल से नदी को पार करना
मोहभंग की नदी में उतरकर ही मानोगे !

                                   --कैलाश नीहारिका

निर्मम अलगाव के दौर में

 

कोई बात करो
जो मरहम हो
अनदिखे ज़ख्मों के दौर में ।
 
कोई बात करो
जो वाणी दे
विवश मौन के दौर में ।
 
कोई बात करो
जो आस किरण हो
अन्धे न्याय के दौर में !
 
कोई बात करो
जो थाम ले कसकर
निर्मम अलगाव के दौर में।
 
            - कैलाश नीहारिका

सौदागर नहीं थे

सौदाई बने जो सौदागर नहीं थे
शैदाई सही वे पेशावर नहीं थे

उन्हीं ने तराशी थी अपनी विरासत
वे बेघर मुसाफिर जोरावर नहीं थे

मामूली रहा जिनका होना जहां में
वे मज़बूर सनकी कद्दावर नहीं थे

उन्हें भी किसी से मोहब्बत हुई थी
वे अपनी बला के चारागर नहीं थे

कोई क्या समझता नादानी भरी जिद
वे जश्ने चमन के दीदावर नहीं थे
 
                      -- कैलाश नीहारिका

 

पायदानों पर रुकी

 

पायदानों पर रुकी अटकी ग़ज़ल
शोख कंधों पर झुकी लटकी ग़ज़ल

तुम हवाले दे रहे हो खूब पर
आप अपनी बात से हटती ग़ज़ल

रोज़ सपने टालती-सी नींद है
जागने के पाठ को रटती  ग़ज़ल

कुन्द होकर मिट गईं जब तल्खियाँ
ज़िन्दगी की सान क्या चढ़ती ग़ज़ल

आज तक हासिल हुईं रुसवाइयाँ 
 किसलिए दिन रात यूँ खटती ग़ज़ल
                   
                    -- कैलाश नीहारिका

Tuesday, 20 September 2022

क्षुद्रताएँ प्रेम में

प्रेम सोचते हुए
प्रेम को जीते हुए
प्रेम में रँगा फ़कीर
तिनका- तिनका जोड़कर सहेजता है ताकि
कचरे-सा बुहार सके वह सब
जो नहीं है प्रेम।

मैंने देखा
तुमने देखा
सबने देखा --
हर फ़कीर में रचा-बसा कोई श्रीमन्त
हाँ, वही सामन्त
जो प्रायः मुस्कराता है
जीवन की समस्त क्षुद्रताओं पर।

सोचती हूँ अक्सर
क्यों नहीं स्वीकार कर लेता फ़कीर
नैसर्गिक बहते,उमड़ते प्रेम को
प्रेम की समस्त
खर-पतवार-सी क्षुद्र उपजों के साथ ही !

देखता है एक दिन
चौंक कर फ़कीर
उम्र-भर का अपना काम
प्रेम कहीं रुक गया झील-सा
पा गया विस्तार अहम दूर-दूर तक ।

हारता नहीं फ़कीर
कहता है कभी  फुसफुसाते हुए
और कभी डंके की चोट पर कि
सृष्टि में सबसे कठिन काम है
प्रेम का विस्तार !

                             -  कैलाश नीहारिका   

Thursday, 18 August 2022

 

                1 
 
   किसी के लिए दाना-पानी की
   व्यवस्था करने से
   नहीं मिल जाती
   उस पर हुक्म चलाने की सिद्धि
   सीखा यह मैंने
   नन्ही चिड़िया से !

                       
               2 
 
मैं तुम्हारे साथ जुड़ना ही नहीं 
तुम्हारा विस्तार होना चाहती हूँ 
जैसे एक और एक ग्यारह ! 

              3

जीने के लिए
इंद्रधनुष ज़रूरी हैं
जो दूर कहीं दिखते ज़रूर हैं
पर होते नहीं ! 
 
             4
 
दीवारें मुझे पसन्द हैं 
पर मैं उन तमाम 
दरवाजों और खिड़कियों की भी  
आभारी हूँ 
जो मुझे मौका देते हैं कि उन्हें खोलूँ या 
बन्द कर लूँ  !
 
           5 
 
मानवीय  होना
जैसे किसी फुनगी का
धीरे-धीरे जड़ में बदलना !
जैसे किसी कंगूरे का
धीरे-धीरे नींव हो जाना !
             
            -- कैलाश नीहारिका