Friday, 22 January 2016

अकिंचित सवारी



सुबह और शाम की प्रत्यञ्चा से 
छूटकर संकेतबद्ध बाण-सी 
मैं महानगर की सड़कों पर
झेलती भरसक .
विशालकाय बसों और आर.टी.वी.का सफ़र
दबाते-बहलाते  भीतरी सुगबुगाहट
मीरा और बुल्ले शाह को गुनगुनाते
उठा सकने से अधिक लदान लिए
चीन्हती राह अपनी !

कभी फिर झूलते अदृश्य-सा झूला
या कोई इन्द्रधनुष लादे-ढोते
सींचते धूल बेख़याली की
सहसा अपने धरातल पर लौटती
अचकचाकर 
ठोकर बचाती  सँभलती 
इक  महानगरीय अकिंचित सवारी !

Thursday, 14 January 2016

अश्रु-सी शक्तिजा

मैं चुम्बकधर्मी
ठोकते हो कील क्यों !
दुर्ग की  देहरी पे
दण्डवत नमन से
मुझको क्या
मैं पलक के चँवर  में लीन
अश्रु-सी
कोमल शक्तिजा !

दुर्दान्त एषणाओं की
विजय-पराजय से विश्रान्त
मैं  सूर्य-कणिका
पसरना है, लौटना है मुझे !

               
                                      कैलाश नीहारिका