Thursday, 8 March 2012

परवाज़

महकता   हरसिंगार  बाक़ी   है
मौसमों   में   बहार   बाक़ी   है

सुरमई शाम किस क़दर तन्हा
आज  फिर  इंतज़ार  बाक़ी  है

आसमां  भी बहुत   क़रीबी   है
पर  ज़मीं  का दुलार  बाक़ी  है

साथ  तू  है  ख़ुशी  मयस्सर है  
किसलिए   इंतज़ार  बाक़ी   है

जोश  परवाज़  का  बनाए रख
नगम- ए - शहसवार  बाक़ी है

                   कैलाश नीहारिका 

              ( गगनांचल में प्रकाशित )

1 Comments:

At 23 March 2012 at 21:24 , Blogger S.N SHUKLA said...

सुन्दर सृजन,सुन्दर भावाभिव्यक्ति.

कृपया मेरे ब्लॉग" meri kavitayen" की नवीनतम पोस्ट पर भी पधारें, आभारी होऊंगा .

 

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