जिसे मैं फैंक दिया करती हूँ
कचरे की मानिन्द
कबाड़ी ढूँढ लेता है
उसी में कुछ ज़रूरी।
कचरे की मानिन्द
कबाड़ी ढूँढ लेता है
उसी में कुछ ज़रूरी।
कविता एक ऐसी उपज है जिसकी जड़ें गहरी हैं . कविता के शब्दों से ही अर्थ नहीं झरते,उसके शब्द जिस 'स्पेस' से आवरण युक्त होते हैं, वह 'स्पेस' भी कविता कहता है.कविता को समझने के लिए उसके 'स्पेस ' का मर्म समझना ज़रूरी है . मर्मज्ञ ही हो सकता है कविता का पाठक ! कविता एक दर्द है / हम जो हैं / उससे जुदा होने का दर्द / कविता है _ कैलाश नीहारिका