Tuesday, 20 September 2022

जो नहीं है प्रेम

प्रेम सोचते हुए
प्रेम को जीते हुए
प्रेम में रँगा फ़कीर
तिनके-तिनके को सहेजता है झाड़ू में
कि कचरे-सा बुहार सके वह सब
जो नहीं है प्रेम ।

मैंने देखा  
सबने देखा होगा --
हर फ़कीर में रचा-बसा कोई श्रीमन्त
हाँ, वही सामन्त
जो प्रायः मुस्कराता है
जीवन की समस्त क्षुद्रताओं पर।

सोचती हूँ अक्सर
क्यों नहीं स्वीकार कर लेता फ़कीर
नैसर्गिक बहते,उमड़ते प्रेम को
प्रेम की समस्त
खर-पतवार-सी क्षुद्र उपजों के साथ ही !

देखता है एक दिन
चौंक कर फ़कीर
उम्र-भर का अपना काम
प्रेम कहीं रुक गया झील-सा
पा गया विस्तार अहम दूर-दूर तक ।

हारता नहीं फ़कीर
कहता है कभी फुसफुसाते हुए
और कभी डंके की चोट पर कि
सृष्टि में सबसे कठिन काम है
प्रेम का विस्तार !

                             -  कैलाश नीहारिका   

Sunday, 24 July 2022

पेंच

 मैंने सदा चाहा 

तुम्हारा प्रेमपूर्ण होना 

जबकि मेरा प्रेमपूर्ण होना 

दशकों से छीज रहा है 

बस 

यहीं सारा पेंच अड़ा है ।

मैं का विसर्जन करते हुए 

मैं पुनर्नवा होने की 

कोशिश में हूँ। 

बूँद बूँद शब्द

शब्दों में 

कहाँ समाती है 

कविता !

 

झरते -झरते
निथर जाओगे
एक दिन ! 


हाशिये से 

ख़ारिज होंगे 

बेज़ुबान लोग

       - कैलाश नीहारिका 



 

 

 

Thursday, 23 June 2022

नदी का होना

 मैंने नदियाँ पार कीं

बिना जल को छुए

समझ आते-आते आई कि 

जो पार किये वे मात्र पुल थे 

नदी के होने की बस साक्षी रही।


फिर कभी पाया कि मिट गई नदी

पता चला वह नदी नहीं 

बरसाती जल का रास्ता था

बहुत बाद में जाना 

नदी बारहमासी होती है 

किसी हिमनद की आत्मजा।


अब तमाम नहरों-नालों 

कुओं झीलों तालाबों को देखते हुए

सूझते हैं मुझे ग्लेशियर .....

यूँ तो मैं वर्षा और ओस की भी साक्षी हूँ।


ठीक समझे हो 

मैं हिम के समान्तर सोच रही थी 

वाष्पीकरण को भी।


Monday, 20 June 2022

बन्द खाली मुट्ठियाँ


इससे पहले कि
आँखों और ओठों से बाहर आते-आते
मोहक मुस्कान
किसी को विभोर कर 
अपना विस्तार कर सके  
वह झट चेहरे पर पसरी 
इर्द-गिर्द की रेखाओं में  
बिला जाती है।

मुस्कान के विलुप्त होने का रहस्य 
गहरा जुड़ा है बन्द मुट्ठियों से 
जो खाली हैं  
पर, भरी होने का भ्रम देती हैं ।
तोड़ ही दूँगी यह भ्रम 
खोलकर खाली मुट्ठियाँ 
तेरी ओर बढ़ने को
तुम्हें भींच सकने को !  

                        कैलाश नीहारिका
 

Wednesday, 13 January 2021

कौशल

उन सबके पास 

अपने-अपने प्याले हैं

शायद भरे हैं 

किसी के हाथ में थमा 

किसी के अधरों से सटा 

और किसी का मेज़ पर 

धरा है ढका ।

किसी-किसी के होंठों के कोनों से  

रिसती बारीक धार 

चुगली-सी करती है कि 

 पीना नहीं आता उनको। 

जिनके होंठों से कभी नहीं रिसता तरल 

वे पीने में पारंगत हैं 

या शायद उनका प्याला ही खाली हो ! 

जो भी हो 

यह निजता का मुद्दा है । 

थामा है कौशल से मैंने अपना प्याला 

अधरों से सटा रखा है 

रिसता नहीं तरल 

सोचते होंगे वे -- आता है इसे पीना 

 या खाली भी हो सकता है प्याला ! 

                 - कैलाश नीहारिका

Monday, 21 December 2020

कविता का अपनापा

कविता लिखना 

जूता गाँठना नहीं है कि 

जिसकी आवश्यकता और उपयोगिता सामने हो .

कविता लिखना उच्छवास छोड़ने से पहले 

उसे लय देना है.

उच्छवास में भले ही कुछ भी सहेजा गया हो ---

मूलभूत आवश्यकताओं से लेकर 

अनदिखी प्रबल एषणाओं तक !

पर कविता में रची-बसी वह लय 

किसी प्रज्ञा की गहराई से निकल     

पाठक की प्रज्ञा को गले लगाती है  

भरपूर अपनापे से !

                         - कैलाश नीहारिका