Friday, 2 March 2018

खाये-पीये और अघाए

खाये-पीये और अघाये यार बहुत
गुप-चुप दिखते धार लगे औजार बहुत
 
लम्बी-चौड़ी घोर सियासी महफ़िल में
कैसे कह दूँ जीवन के दिन चार बहुत

चाराजोई ही कर लेते हाकिम से
हम जैसे जो मिल सकते खुद्दार बहुत

आँसू पी जाते बिन बोले चुपके-से 
यूँ हँसते दिखते रहते हुशियार बहुत

किस्सागोई तो अब मुश्किल बात नहीं
दायें-बायें रोज़ दिखें  किरदार बहुत

मौके के मुद्दों पर हम सब चुप रहते
मिलते-जुलते साजिश को तैयार बहुत
 
दिनभर खटते रहकर उसने क्या जोड़ा
माना खाते खोल रही सरकार बहुत

तिनका भी तोड़े न मुसाहिब पूरा दिन 
छुट्टी करने को मिलते इतवार बहुत





           2222   222  2222
                                         कैलाश नीहारिका

Sunday, 7 January 2018

तत्पर हथेलियाँ


बात करते-करते
संग-सम्बन्धों के विमर्श पर  
अनमने-से मौन ओढ़ लेते हो
किसको ज्ञात नहीं कि 
बन्द मुट्ठियों में
आसक्तियों के कसे-सटे रेशे
सदा एक-से नहीं रहते ।

तत्पर हथेलियाँ
यूँ ही नहीं थाम लेतीं
आगे बढ़े हाथ को ।
मन की तहों में दबा रखे
अदिखे अबूझ रहस्य
ऐसे ही रेशमी फिसलन-से
औचक नहीं खुल जाते ।
दृष्टि स्वर स्पर्श में 
टेरती कशिश 
बेवजह नहीं होती।
 
जंगल में नाचने से पहले मोर
अकारण ही आकुल होकर 
नहीं जोहता
सहचर का अखुट्ट भरोसा ।

यात्रा कोई
बिना किसी पृष्ठभूमि के 
अधर से शुरू नहीं होती 
सोचो तो, ऐसा भी जटिल नहीं
पाँव और डगर के सम्बन्धों की टोह लेना।

                    कैलाश नीहारिका 




                             
      

Tuesday, 2 January 2018

पीछे मुड़कर भी देखना



पायल, बिन्दी, कँगना से 
आगे निकल चुकी लड़की   
पीछे मुड़कर भी देखना
चीन्हना उस साम्राज्य को
जहाँ गृह-कारा में बंद कई ज़िन्दा अस्तित्व और
विवशता के रुदन में दब गए मनभावन गीत
अजगरी जकड़न की वेदना से त्रस्त हैं  !

पकड़ उंगली तुम्हारी   
कुछ दबे गीतों के सुर भी  
दूर तक साथ चल देंगे
जो अभी असमंजस में हैं
होंठों की देहरी के भीतर !

तुम देखना मुड़कर 
कि अवरुद्ध साँसों को कुछ साफ़ हवा मिल सके 
कि सुन्न पंखों में जागें स्पन्दन 
कि फैसलों के पीछे हों कई पुख़्ता कदम 
कि शोर की जगह संगीत ले !

दोहराऊँगी आह्वान कि 
बेगार मत ढोना     
किसी गन्तव्यहीन यात्रा की
बहुत-से पिंजरे हटाने हैं तुम्हें
जिनसे तुम मुक्त हो !
 
मैं मिलूँगी तुम्हें प्रतीक्षारत 
इसी मोड़ पर
हठी गान्धारी की आँखों पर से 
अनदिखी पट्टियाँ खोलते  
दुखती उँगलियों से !

                  कैलाश नीहारिका

Saturday, 30 December 2017

कविता की बात

उन्होंने कहा / कर्म से बदलेगी दुनिया / कविता से नहीं
मैंने खोजबीन की / कर्मवीर से मिली / देखा उसका कर्म
बातचीत की / चकित रह गई
बातें उसकी कविता ही थीं !

                           कैलाश नीहारिका    

Friday, 29 December 2017

आस का आँचल

212   2212   2212 

कौन-सा आँगन जहाँ  पर ग़म नहीं  
आस का आँचल मगर कुछ कम नहीं

रूठकर आँसू बहाना छोड़ दो
दर्द का बेइन्तहा आलम नहीं
 
क्या कहें ये ज़ख्म ताज़ा क्यों रहे 
पालते नासूर फिर मरहम नहीं

मौज दरिया की समन्दर से मिली
उम्र भर की वह रवानी कम नहीं

राख में क्यों भूनते हो तल्खियाँ
आज जलवागर अँगारे कम नहीं
 
कब मुकम्मल कुछ मिला इस दौड़ में
मत समझना अब किसी में दम नहीं

चाँदनी का नूर भी दिलक़श बहुत
बीत जाए दोपहर कुछ ग़म नहीं
 
तुम  मिले तो आज फिर अच्छा लगा
लोग तो मिलते रहे महरम नहीं           

                                  कैलाश नीहारिका



                  

सुर्ख़ियों में दिखते हो

 
आज भी सुर्ख़ियों में दिखते हो
इश्तहारों भरे हो बिकते हो

बैठकों में सजाई जलधारा
बैठ दरिया किनारे लिखते हो

थोक में बिक रहे हैं शंख यहाँ
फूँकते हो कभी या डरते हो

आजकल फूल पौधे बिकते हैं 
 ख़ूब बगिया सँभाले खिलते हो
 
इश्क़ में साथ-भर रहना मुश्किल
 फुरसती  शौक कितने रखते हो

आदमी आदमी से दूर हुआ
 जान- पहचान का दम भरते हो            

बेगुनाही सिसकती सदमे में 
 किसलिए हाथ जोड़े दिखते हो      

            कैलाश नीहारिका 

Thursday, 21 December 2017

अनन्य प्रेम


किसी एक से ही
प्रेम करती हूँ
अनन्य प्रेम
पर स्तब्ध हूँ कि 
थोड़ा-थोड़ा सबमें है वह ! 

         कैलाश नीहारिका