Friday, 1 December 2017

बेहुनर हाथ

 
बेहुनर हाथ किसी काबिल बना लूँ तो चलूँ
आस की  डोर हथेली में  थमा दूँ तो चलूँ

मोड़ दर मोड़ मिलेंगे राह भूले चेहरे
ठेठ पहचान निगाहों में बसा लूँ तो चलूँ                    

रात-भर नींद करेगी बेवफ़ा-सी बतकही 
जश्न की साँझ अँधेरों से बचा लूँ तो चलूँ

पाँव नाज़ुक उलझ गए कंकरीली राह से 
अजनबी राह अभी अपनी बना लूँ तो चलूँ 

रोज़ क्या साथ रहेंगे फुरसतों के सिलसिले
धूल में लीन हुए लम्हे  उठा लूँ तो चलूँ

                             कैलाश नीहारिका 

Monday, 25 July 2016

प्रेम से दूर

मैं-मैं की टेर लिए
सहचरों के बीच भी
पाखी अकेला
सह नहीं पाता
प्रेम की उपस्थिति
प्रेम का विस्तार
सहसा उड़ जाएगा किसी दिन
प्रेम की अडोल नम्यता से
घृणा करते-करते !

                      कैलाश नीहारिका

Tuesday, 19 July 2016

परिक्रमा से बाहर



दिलेर क्या दुराग्रही वे
जा नहीं पाये कभी
धर्मोन्माद की परिधि से बाहर !
अबूझे रास्तों के
अज्ञात मोड़ों से आशंकित
घूमते ही रहेंगे गोल-गोल
चक्रव्यूह को पुष्ट करते-से  !

धड़कनें सहेजते हैं थमकर
परिक्रमा से बाहर होने की
आशंका-भर से
काँप उठते हैं कहीं भीतर 
जीने-भर का ही इंगित नहीं स्पन्दन
मरते हुए भी जिजीविषा को
ओढ़ लेता है कम्पन !

                        
कैलाश नीहारिका 

Thursday, 5 May 2016

संचित विष

दंश की  सम्भावनाओं को
कुचला मसला
कर दिया निर्मूल
फिर भी 
बच नहीं पाए
विष से
खदबदाता था जो भीतर
चिरपोषित
अमूल्य धरोहर-सा संचित !

                        कैलाश नीहारिका

Tuesday, 23 June 2015

किरदार हम रहे



          2222 1212 22 1212                                 

वहशत का दौर देखकर  बेज़ार हम रहे
पानी में छोड़ कश्तियाँ इस पार हम रहे
 
सतरंगे ख्वाब ज़हन में गुमनाम-से बसे
 किसके ये तीर-तरकश गुनहगार हम रहे
 
 ये शज़र सदाबहार इसका राज़ क्या कहें
  तन्हा-सी एक झील का किरदार हम रहे

  जाने  बेइख्तियार आँसू  किस तरह थमे
  दरिया बहुत  पुरजोश था लाचार हम रहे

  दीवानापन कि रिंदगी हम कब समझ सके
  पुरजश्न  लहरें  लेकिन  खबरदार  हम  रहे                  
                           

                                  कैलाश नीहारिका 

Tuesday, 9 June 2015

ख़ुशी सौंपी नहीं

       
रोशनी तो सब जगह पहुँची नहीं
 खोखले वादे ख़ुशी उपजी नहीं

किस तरह  नग़में  हवाओं के सुनें
सिर्फ़ तहख़ाने  वहाँ  खिड़की  नहीं

अश्क़ ठहरे ही नहीं  पलकों तले
रात तकिये से नमी फिसली नहीं

साथ उनका एक जादू-सा लगा
दूर  होते ही ख़ुशी ठहरी नहीं
 
आहटों पर चौंक जाती जुस्तजू
नींद की परियाँ वहाँ उतरी नहीं

जलजलों की खूब चर्चा थी मगर
वह इमारत आज तक दरकी नहीं

कौन करता उन हवाओं से गिला    
खुशबुएँ जिनसे कभी सँभली नहीं


 
                 

Friday, 5 June 2015

बेसबब कहा होता

       122  212  1222

दरो-दीवार  सब  ढहा  होता 
कभी तो आसमां जिया होता

सँभल के यूँ नपा-तुला कहना
कभी कुछ  बेसबब कहा होता 

कहा  हँसते हुए  सरे-ख़ल्क़त 
नज़र-भर रीझ के  कहा होता

दहकती आग की तपिश झेली
घुमड़ता-सा धुआँ  सहा  होता
 
नयन की ढाल से लुढ़कता-सा
लरजता अश्क़ ही बहा होता
 
अभी ख़ारिज सही फ़िदा होना
वह कभी  मुंतज़िर  रहा  होता
 
छुपा  ही वो रहा  खुदाई में
कभी तो रूबरू  रहा होता

                 कैलाश नीहारिका