Friday, 9 February 2018

परिंदों को बुला लेते हैं

 

  ओढ़ के धूप हमें ठण्डी हवा देते हैं   
  पेड़ खामोश सदा माँ-सी दुआ देते हैं 

  साँस-दर-साँस निभाएं खूब रिश्ते अपने
  ये बिना शर्त परिंदों को बुला लेते हैं 


  परत-दर-परत सहेजें सब निशां चोटों के
  आह भरते कि नई  शाखें  उगा लेते हैं 


  ख़ास अंदाज़ लिए झूमें कभी मस्ती में
  ओढ़ते रूप कि मौसम का पता देते हैं   

  दिन कहीं रात कहीं ऐसे मुसाफिर भी हैं                  
  राह-भर चाव  दिखाते ये विदा देते हैं 
     
                       कैलाश नीहारिका               
   212 2222 212  222


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