Tuesday, 16 January 2018

क्यों चल दिए

काश कह पाते कभी  क्यों चल दिए
रुक सकोगे क्या अभी क्यों चल दिए

रात-भर दीये जले खामोश ही
सुबह चहकी भी नहीं क्यों चल दिए

बात  सहने का ज़माना लद गया
किसलिए सबकी सही क्यों चल दिए

आहटों की गूँज-भर बाकी रही
बात अब भी अनकही क्यों चल दिए

खो गई सरगम हमेशा टेरती
चार दिन थी चाँदनी क्यों चल दिए

होंठ हिलते देखते अरदास के
आरजू थी अधसुनी क्यों चल दिए

    212  2212  2212               
                       कैलाश नीहारिका

1 comment: