Thursday, 14 January 2016

कील

मैं चुम्बकधर्मी
ठोकते हो कील क्यों !
पलक के चँवर  में लीन
मैं अश्रु-सी
कोमल शक्तिजा !

दुर्ग की  देहरी पे
दण्डवत नमन से
मुझको क्या !
मैं परछाई की माया से परे
एषणाओं की विजय-पराजय से विश्रान्त
मैं एक सूर्य-कणिका
पसरना है, लौटना है मुझे !

            
                                      कैलाश नीहारिका

2 Comments:

At 15 January 2016 at 02:03 , Blogger ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "६८ वें सेना दिवस की शुभकामनाएं - ब्लॉग बुलेटिन " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

 
At 15 January 2016 at 05:13 , Blogger संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत खूब

 

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