Saturday, 5 December 2015

सूरज के छिपने तक


मुझको नहीं चाहिए
कोई विशाल भूखण्ड
कि जिसके निमित्त मैं दौडूँ
सूरज के छिपने तक !

बस, इक ठौर बहुत है
स्नेह पगे बसेरों में
अंगारे तापूँ, बतियाऊँ जहाँ
शीत लहर से ठिठुराते जाड़े में
और कभी लू की लपटों से बचके 
शीतल साँसें लूँ
उस कर्मशील परिसर में
एकलपन की व्यथाओं से हटकर !

सँगी-साथी ऐसे कि
जिनसे बाँटूँ दाना-पानी
और सहज ही साझा कर लूँ
पलकों में अटके जलकण भी !

इस अन्धी दौड़ के अँधियारों से बाहर रहकर       
सुलगा दूँ ऊर्जा सारी अपनी
खर्च दूँ सारा अर्जन, कौशल !
स्नेह बटोरूँ
धरती की गलबहियों, बतकहियों से
जहाँ कहीं प्रकृति पुकारे
बाँहें पसारे जाऊँ !

क्यों न सहेज के रख लूँ
कुछ गीत, हँसी और छोटे-छोटे खेल !
सच, नहीं दौड़ना मुझको
सूरज के छिपने तक !

                            कैलाश नीहारिका

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