Friday, 4 December 2015

उजालों का भ्रम

हर साल कहाँ होती है दिवाली
ये  तो सब हैं कि मना लेते हैं !

वे चौदह बरस  प्रतीक्षा भरे
कंकड़-बिंधे-से पाँव
किरकरी-सी झेलती आँखें
कई निद्राहीन रातें ………उपरान्त   
आ सकी दिवाली !

इधर अब इतने दीप-बत्तियाँ असंख्य
इनके प्रतिबिम्ब मोहक-से
भ्रम रचते उजालों  का
बाज़ारी चोचले !

हाँ,  मनाऊँगी दिवाली  भी कभी
मगर फिलवक़्त इक दीपक जलाकर
ज़रूरी है कि नियमित  कर सकूँ  त्राटक
कि  ज्योति कायम रहे नयनों में
तभी तो जब किसी
सुदूर दिवाली पर निहारूँ 
तेरी  निष्कम्प लौ
सहेज लूँ  उजाले निरापद !

                               कैलाश नीहारिका


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