Friday, 4 December 2015

लौटना प्रेम में



सुनो सिकन्दर 
दुर्ग के खण्डहरी कंगूरे पर
ध्वजा फहराने को हल्कान तुम
समझो तो अपनी औकात  को
एक निस्पृह शिशु  भी
तुम्हें समझा नहीं सकता
प्रेम और कब्ज़े का फ़र्क !

 
क्यों नकारते हो
नमी, ताप, हवा के ज़मीनी वज़ूद को
बीज को जड़ें बनने से रोकना
निपट आत्मघाती है !
और फिर 
विषम समीकरणों के बावजूद
फलना-फूलना
कर्मठता ही नहीं, नियति भी है
शायद ही समझ सको
सम्भावनाओं के फलित होने की 
इक अबूझ परिपाटी को !

तुम्हें चौंकाती हैं 
रसरी हवाओं में ची-सी सुरभियाँ 
सूँघते हुए धुआँ सोचो ज़रा 
कितनी तो क्रूर है जंगलों की आग !
समझो अपनी सीमाओं को
सारी पृथ्वी को
जीतने की चाह लिए
अन्त में घायल तड़पते
लौट भी सकोगे अपने ठौर
विजय जाने कहाँ तक साथ चले.………
लौटना प्रेम में
श्रेयस्कर है सदा !

अपनी परछाइयों से गुत्थमगुत्था हुए 
घायल क्यों पड़े हो चारों खाने चित्त 
काश, तुम्हें कह पाती उ मैदान में--चलो उठो  
झाड़ लो अपना लिबास ..... और
अपनी राह लो !


                                कैलाश नीहारिका                        

                









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