Monday, 21 December 2015

खालिस प्रेम


मोहपाश के समान्तर 
ओ पूर्वाग्रही यात्री
कब से खोजने चले हो प्रेम खालिस
मान भी लो
मिश्रित ही उपलब्ध है प्रेम यहाँ !


खोदते कहीं पे कहीं से बटोरते
वे दिपदिपाते कण प्रेम के
लाद चुके कितनी पोटलियाँ
अयस्कों भरी
अनमने हो सोचकर कि
क्या होता है सिर्फ प्रेम !

सुनो,
क्यों नहीं स्वीकार लेते
इन अयस्कों में निहित प्रेम को
ओ हठीले विक्रम !

अन्यथा चलो, जलाओ भट्ठी
झेलते हुए तेज़ाबी धुआँ
शोध लो अयस्कों का संचयन !

              कैलाश नीहारिका  

  






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