Monday, 21 December 2015

आत्म संवाद--2


मोहपाश के समान्तर 
ओ पूर्वाग्रही यात्री
कब से चले हो खोजने प्रेम खालिस
कितने ही अयस्कों से
भर ली पोटलियाँ
खोदते कहीं पे कहीं से बटोरते
मिल नहीं सका कहीं सिर्फ प्रेम
अनमने हो सोचकर कि
कहाँ छिपे होंगे
वे दिपदिपाते कण प्रेम के !
 ओ हठीले विक्रम
क्यों नहीं स्वीकार लेते
मिश्रित अयस्कों में निहित प्रेम को
या फिर यूँ ही लगाएगा ठहाके
सिरफिरा बेताल
अन्यथा आओ जलाओ भट्ठी
झेलो तेज़ाबी धुआँ
शोध लो अयस्कों का संचयन !

              कैलाश नीहारिका  

  






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