Friday, 25 December 2015

वृन्दावन में



यमुना के तट  पर
वृन्दावन में देखा मैंने
असमंजस से उस सुनयना मुखरा को
नीले  कोर की श्वेत साड़ी पहने इठलाती-सी  
बेलाग विचरते
शायद बँगाली विधवा .....

वह सधवा थी
मुस्काती ऐसे साँचों के सन्दर्भों पर 
नेह  रिसता-सा उसकी पलकों की कोरों से
पूजा की थाली का आडम्बर ओढ़े वह
एक-एक आगन्तुक को जोहती फिरती थी

गतयौवना  अपराजिता
कोमलता से गर्दन ताने  दोहराती ---
बंगाल से हूँ, यहाँ 'श्याम वृन्दा और यमुना ' की शरणागत हूँ !
आक्रामक मोहकता से
झटका उसने उस पत्रकार-से
वाचाल ख्वामख्वाह खेवट  को
कि  ' नहीं पता तो रहो मौन '
फिर  झरने लगे शब्द उसके--
'नहीं कहानी एक-सी सबकी , नहीं बराबर सभी उंगलियाँ
सबकी अपनी-अपनी गाथा '!

उसकी बातों से जाना
वे सभ्य समाज की विडम्बनाओं के चलते
बेडोर पतंग होने से  बेहतर
किसी माला का मनका होने को प्रस्तुत 
या कि कछुए-से सुरक्षा कवच में आनन्दित !

वह सधवा थी
पति व बच्चों के संग
कभी धुर बंगाल से पहुँची थी वृन्दावन की गलियों में
गुमनाम ज़िन्दगी जीने को तत्पर
बाप से बड़ी वयस का उसका पति सदा शर्मिन्दा
अति बेमेल विवाह से
वह वहीं कहीं  था
किसी मंदिर के परिसर में !

                                                      कैलाश नीहारिका

Monday, 21 December 2015

खालिस प्रेम


मोहपाश के समान्तर 
ओ पूर्वाग्रही यात्री
कब से खोजने चले हो प्रेम खालिस
मान भी लो
मिश्रित ही उपलब्ध है प्रेम यहाँ !


खोदते कहीं पे कहीं से बटोरते
वे दिपदिपाते कण प्रेम के
लाद चुके कितनी पोटलियाँ
अयस्कों भरी
अनमने हो सोचकर कि
क्या होता है सिर्फ प्रेम !

सुनो,
क्यों नहीं स्वीकार लेते
इन अयस्कों में निहित प्रेम को
ओ हठीले विक्रम !

अन्यथा चलो, जलाओ भट्ठी
झेलते हुए तेज़ाबी धुआँ
शोध लो अयस्कों का संचयन !

              कैलाश नीहारिका  

  






Saturday, 5 December 2015

सूरज के छिपने तक


सुनो, मुझे नहीं चाहिए
कोई विशाल भूखण्ड
बस इक ठौर बहुत है
संगी कुटीरों के संग
शीत लहर में जहाँ अंगारे तापूँ , बतियाऊँ
और कभी लू की लपटों से बचकर कर्म करूँ !

सँगी-साथी ऐसे
जिनसे बाँटूँ  दाना-पानी
और सहज ही साझा कर लूँ
पलकों में अटके जलकण भी !

स्नेह बटोरूँ
धरती की गलबहियों, बतकहियों से
दूर-निकट प्रकृति पुकारे
बाँहें पसारे जाऊँ !

अँधियारे और अन्धी दौड़ से बाहर रहकर
फूँक दूँ ऊर्जा सारी
खर्च दूँ सारा अर्जन, कौशल !

क्यों न सहेज के रख लूँ
कुछ गान, हँसी और छोटे-छोटे खेल !
पर, नहीं दौड़ना मुझको
सूरज के छिपने तक !

                            कैलाश नीहारिका

Friday, 4 December 2015

लौटना प्रेम में


दुर्ग के  खण्डहरी  कंगूरे पर
ध्वजा को थामे रहने के लिए हल्कान तुम
सुनो, समझो अपनी औकात  को
एक निस्पृह शिशु  भी
तुम्हें समझा नहीं सकता
प्रेम और कब्ज़े का फ़र्क !


सुनो सिकन्दर !
क्यों नकारते हो
नमी, ताप, हवा के ज़मीनी वज़ूद को
बीज को जड़ें बनने से रोकना
निपट आत्मघाती है !
और फिर 
विषम समीकरणों के बावजूद
फलना-फूलना
कर्मठता ही नहीं, नियति भी है
शायद ही समझ सको
सम्भावनाओं के फलित होने की 
इक अबूझ परिपाटी को !

तुम्हें चौंकाता है
सक्रिय हवाओं में रचा-बसा 
अस्तित्व सुरभियों का  
सूँघने लगते हो बारूद
कितना तो क्रूर है जंगलों का धुआँ-धुआँ होना !

समझो अपनी सीमाओं को
सारी पृथ्वी को
जीतने की चाह लिए
अन्त में घायल तड़पते
लौट भी सके तुम अपने ठौर !

विजय जाने कहाँ तक साथ चले.………
लौटना प्रेम में
श्रेयस्कर है सदा !

अपनी परछाइयों से गुत्थमगुत्था हुए 
क्यों पड़े हो चारों खाने चित्त 
इस मैदान में !
काश तुम्हें कह सकती--चलो उठो  
झाड़ लो अपना लिबास ..... और
अपनी राह लो !


                                कैलाश नीहारिका                        

                









उजालों का भ्रम

हर साल कहाँ होती है दिवाली
ये  तो सब हैं कि मना लेते हैं !

वे चौदह बरस  प्रतीक्षा भरे
कंकड़-बिंधे-से पाँव
किरकरी-सी झेलती आँखें
कई निद्राहीन रातें ………उपरान्त   
आ सकी दिवाली !

इधर अब इतने दीप-बत्तियाँ असंख्य
इनके प्रतिबिम्ब मोहक-से
भ्रम रचते उजालों  का
बाज़ारी चोचले !

हाँ,  मनाऊँगी दिवाली  भी कभी
मगर फिलवक़्त इक दीपक जलाकर
ज़रूरी है कि नियमित  कर सकूँ  त्राटक
कि  ज्योति कायम रहे नयनों में
तभी तो जब किसी
सुदूर दिवाली पर निहारूँ 
तेरी  निष्कम्प लौ
सहेज लूँ  उजाले निरापद !

                               कैलाश नीहारिका