Sunday, 3 May 2015

यायावर अग्नि




सपनों के बीज छिटकाती
चलती है यायावर अग्नि
उसको छूकर जाना
ज़िन्दा हूँ अभी 
 
मैं ज़िन्दा हूँ कि
शेष है बेताबी मुझमें
बेताबी जो इक आग है 
सुलगती, लहराती यह धूम्रहीन आग  
कभी, कहीं खरीदी नहीं जा सकी
किसी युग में, किसी दाम पर !

जैसे धुर से मिली 
विरासत में 
एक  जगमगाती मशाल-सी
छू जाए कभी सहसा
किसी बुझी मशाल से .....
रच जाती ऐसे फिर
सौगात-सी अग्नि !

                               कैलाश नीहारिका 

0 Comments:

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home