Monday, 18 May 2015

बुनती हूँ पहचान


देखो न
उस जुलाहे के शिविर में 
चौखटी  बुनावन पर
पहचान बुनते-बुनते ज्ञात ही नहीं मुझे
कितने दिन-रात चुक गए !
और अभी भी अथकी-सी उपस्थित हूँ 
उलझे -सीधे सूत्र  सँवारते हुए
नहीं जानती  कितने सध पाए
और कितने उलझ गए
ताने-बाने के समीकरण !
अभी तो इन सूत्रों को
आत्मसात करने होंगे रंग कई
इक बुनावट का हिस्सा बनने से पहले !


बुनती  हूँ  पहचान
सुबह से रात तक
अद्भुत हैं पहचान के बल उस पार जाना
रोम-रोम में रची-बसी पहचान
कभी क्या मुझको तुम तक पहुँचाएगी
अन्ततः !

                   कैलाश नीहारिका

2 Comments:

At 19 May 2015 at 09:23 , Blogger ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, रावण का ज्ञान - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

 
At 20 May 2015 at 03:51 , Blogger dj said...

सुन्दर अभिव्यक्ति आदरणीया

 

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