Monday, 18 May 2015

बुनती हूँ पहचान


देखो न
उस जुलाहे के शिविर में 
चौखटी  बुनावन पर
पहचान बुनते-बुनते ज्ञात ही नहीं मुझे
कितने दिन-रात चुक गए !
और अभी भी अथकी-सी उपस्थित हूँ 
उलझे -सीधे सूत्र  सँवारते हुए
नहीं जानती  कितने सध पाए
और कितने उलझ गए
ताने-बाने के समीकरण !
अभी तो इन सूत्रों को
आत्मसात करने होंगे रंग कई
इक बुनावट का हिस्सा बनने से पहले !


बुनती  हूँ  पहचान
सुबह से रात तक
अद्भुत हैं पहचान के बल उस पार जाना
रोम-रोम में रची-बसी पहचान
कभी क्या मुझको तुम तक पहुँचाएगी
अन्ततः !

                   कैलाश नीहारिका

Sunday, 3 May 2015

यायावर अग्नि




सपनों के बीज छिटकाती
चलती है यायावर अग्नि
उसको छूकर जाना
ज़िन्दा हूँ अभी 
 
मैं ज़िन्दा हूँ कि
शेष है बेताबी मुझमें
बेताबी जो इक आग है 
सुलगती, लहराती यह धूम्रहीन आग  
कभी, कहीं खरीदी नहीं जा सकी
किसी युग में, किसी दाम पर !

जैसे धुर से मिली 
विरासत में 
एक  जगमगाती मशाल-सी
छू जाए कभी सहसा
किसी बुझी मशाल से .....
रच जाती ऐसे फिर
सौगात-सी अग्नि !

                               कैलाश नीहारिका