Friday, 10 April 2015

स्तब्ध हिलोर



पेंग भरते-भरते मन
बाँधता है और झूले 
झूलना था जिनको उठ के चल दिए

जैसे पकी फसलों पे
बरस जाएं ओले
सारे समीकरण बदल गए

'काश' कहने को भी
चुक-से गए अक्षर
स्वर-व्यञ्जन अश्रुओं  में घुल गए

स्तब्ध है हिलोर-सी
अटकी चाह अधर में
यूँ तो  कई रात-दिन ढल गए !

                 कैलाश नीहारिका

0 Comments:

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home