Wednesday, 22 April 2015

आश्वासनों की मेड़ पर


अब मुझे ठीक-से याद भी नहीं कि 
तुम्हारी थकी-हारी विश्राम-वंचित रातों को  
सहेजने के लिए
कितनी ही बार मैंने सूरज को
आमन्त्रण-धर्मी देहरी से
लौटा दिया
और अक्सर तपते या दमकते दिनों को
आश्वासनों  की मेड़ पर रख
अपनी अधखिली कामनाओं को
औसत दिनचर्या के सिलबट्टे पर पीसते-पीसते
भूल ही गई उस महकते उपवन को
जिसपर अभी पाला नहीं पड़ा था
और जिसे सींचते रहना
दिनचर्या का सहज हिस्सा होना था !

दूर तक आकाश में
बिना डैनों के उड़ती रंगीन पतंगों और
गुब्बारों को देख समझना था
कि न उड़ने पर
उन्हें कोई अकुलाहट नहीं होती !

क्षितिज तक पहुँचती असहज अपनी दीठ को 
मस्तक में तैरती-सी रीझ से जोड़कर 
मापती हूँ पाँव तले धरती
और गति के  उछाल को !
कैसे अटक जाऊँ कबाड़ ढोते-ढोते
पाँव-भर मिट्टी में
जबकि अनन्त यात्राओं के
हठीले आह्वान 
बाँह थामे अग्रसर हैं
अजानी  दिशाओं की ओर !
                                          
सुनो, अनिवार्य है बताना कि
वे दिपदिपाते सपने
प्रबल चुम्बकीय हैं !

         कैलाश नीहारिका 


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