Monday, 19 January 2015

आत्म-संवाद--1

इस विशाल जुआघर में
असंख्य सिक्के खर्च कर लुटे तुम
क्या अब भी सपनों के पीछे दौड़ रहे हो !

बुनते रहे स्वप्न बहुत सहज ही, पर ओह
तुम्हारे स्वप्न उनपर केन्द्रित हैं
जिनके सपनों में नहीं हो तुम !

क्यों बार-बार रचते हो करुण कथा !
घूरते हो इतना क्या
रिश्तों के ताने-बाने को
ऐसे पारदर्शी भी नहीं हैं ये
गुत्थियों में उलझ कर रह जाओ कभी तो 
याद करना छोर के अस्तित्व को

देखो, बिखरी किरचें इतनी
कब समेटी जा सकेंगी जाने !
पहले कुछ मरहम लगा लूँ
पौंछकर ये ज़िन्दगी लहूलुहान
फिर सुनूँगी दास्तां
संग बैठकर, सोने से पहले

और सुनो, क्या अब भी तुम में
सपने देखने की कुव्वत शेष है !

                         कैलाश नीहारिका

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