Sunday, 14 September 2014

ख्वाहिशे-चैन

ख्वाहिशे-चैन में कुछ और भी राहत न रही
हसरतों के अधूरे खेल की चाहत न रही


जिस गुहर को लगे छूने वही शबनम निकला 
अब हमेँ बागवां से भी कुछ रक़ाबत  न रही

रंग खिलते रहे खुशियों भरी फुलवाड़ी में
फूल काँटे सभी  हासिल मगर शिरक़त न रही

सोचते  हैं  यहाँ  हर शय  बहुत  मँहगी  क्यों है  
समझते ही नहीं किस चीज़ की कीमत न रही

वक़्त रिसता रहा ग़फ़लत भरे लम्हे बनके 
होश आई मगर जब जोश औ ज़ुर्रत न रही

                                            कैलाश नीहारिका


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