Saturday, 2 August 2014

फूलों पर इतराते हैं


वे महज़ रखवाले फूलों  पे  इतराते हैं    
क्यों हवा पानी  धरती धूप बिसर जाते हैं

दायरे अपनेपन  के तंग बहुत  तंग हुए 
बाँटकर टुकड़ों  में आकाश  मुस्कराते हैं

ज़िन्दगी भर हो तन्हा और मुस्कराए भी
किस  दिलेरी से  ऐसे  फ़ैसले  सुनाते  हैं

आपने देखा तो होगा कहीं मुकम्मल घर
एक-दूजे  की खुशियों को गले लगाते हैं

पेड़ की छाया भी उनकी वसंत भी उनका 
धूप-बरसातों  में जो  साथ  गुनगुनाते  हैं

                                 कैलाश नीहारिका

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