Wednesday, 27 August 2014

वह शहर का बाशिन्दा

      2212  222  1222  1221

वह शहर का बाशिन्दा सही भूला नहीं गाँव             
बस ख्वाहिशों का झुरमुट परिन्दे को मिली ठाँव

सामान सारा  लेते  हुए छूटा  कुछ  ज़रूर
उसको दिखाई देती कहीं दूर उजड़ी ठाँव

रस्साकशी की थकन फिर झुलसाती कड़ी धूप 
अब कौन सुस्ताए नीम-बरगद की घनी छाँव

वे खोजती-सी नज़रें किसी छत से कहीं दूर
पहुँचा कभी जो शहर फिर लौटा ही नहीं गाँव


अब नापता आकाश  उड़ता  पहियों पर सवार
फिर रात-भर दुखते हैं कभी सूजे  थके पाँव

                        कैलाश नीहारिका

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