Wednesday, 27 August 2014

वह शहर का बाशिन्दा

 
वह शहर का बाशिन्दा सही भूला नहीं गाँव 
यह ख्वाहिशों का जंगल बटोही को मिली ठाँव

कुछ चाहतों की थकन कुछ झुलसाती कड़ी धूप  
वह ढूँढता है अब नीम-बरगद की घनी छाँव

सामान सारा  लेते  हुए छूटा  कुछ  ज़रूर
वह  देखता है स्वप्न  में उजड़ी-सी वही ठाँव

कुछ खोजती-थीं नज़रें किसी छत से कहीं दूर
पहुँचा कभी जो शहर फिर लौटा  ही नहीं गाँव

वह नापता आकाश  उड़ता  पहियों पर सवार
अब  याद-भर में शेष थे वे  दुखते थके पाँव

                                     कैलाश नीहारिका

0 Comments:

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home