Saturday, 2 August 2014

हक़ जताने लगे

      
महज़ रखवाले हैं गुलशन पे हक़ जताने लगे
धूप धरती और हवा पानी को भुनाने लगे         

वार करते हैं सीधे-सादे चेहरों में छुपे
किस दिलेरी से अपने ज़ख्मे-दिल गिनाने लगे
गौर से देखा तो बेपर्दा चेहरे भी दिखे
बाँटके टुकड़ों में आकाश फिर इतराने लगे

आपने देखा तो होता कोई मुकम्मल सफर  
चन्द पहरों के संगी-साथी लौट जाने लगे

खूब सहमे थे वे झुरमुट में बसर करते हुए                                
धूप-बरसातें सहते-सहते गुनगुनाने लगे

         212 222 222 212 212

                   
                        कैलाश नीहारिका

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