Monday, 23 June 2014

रोशनी सब जगह

रोशनी  सब जगह तो पहुँची नहीं
महज़  वादों ने  ख़ुशी  सौंपी  नहीं

किस तरह  नग़में  हवाओं के सुनें
सिर्फ़ तहख़ाने  वहाँ  खिड़की  नहीं

साथ  होना  गज़ब  जादू- सा  लगे
जो नहीं तुम तो कुछ ख़ुशी ही नहीं

अश्क़ खामोश  दरिया में घुल गए
वह नमी चौतरफ क्यों बिखरी नहीं

आहटों  से  जुस्तजू   बढ़ती  रही
नीँद फिर बेफिक्र हो  पसरी नहीं

                    कैलाश नीहारिका

2 Comments:

At 23 June 2014 at 07:10 , Blogger संजय भास्‍कर said...

कमाल के शब्द संजोये हैं, उम्दा

 
At 25 June 2014 at 13:44 , Blogger कैलाश नीहारिका said...

शुक्रिया, भास्कर जी ! स्नेह-सम्पर्क बनाए रखिएगा।

 

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home