Monday, 21 October 2013

स्तब्ध आरोही


आसक्तियों के जंगल में
विषम हवाओं को झेलते हुए
टेरती  तुम्हें …
तुम जो अदीख नहीं हो !

और कभी
शिखरों की चढ़ान पर
अपनी ही अनुगूँज के वर्तुलों से स्तब्ध
दूर तक पसरे
आलोक को ताकते
डबडबाई दीठ से खोजती-सी
अपने आँचल का छोर थामे
ताकने लगूँ
भीतरी धरा पर  
सम्बन्धों की व्यथा से
बाहर आने  का रास्ता !

देख पा रही  दूर-दूर तक
कितनी ही कतारें
बढ़ती इसी  ओर
 धीरे-धीरे
 पगडण्डियों पर !

                       कैलाश नीहारिका

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