Monday, 7 October 2013

अंतर्मेलन

         
आसक्तियों के जंगल में
सहसा किसी दिन
जैसे शाम के धुंधलके में
आँख मलते-मलते
चीन्ह जाऊँ तुम्हें !

या असीम जलराशि के
बुलबुलों से मोहभंग होते ही
भ्रमित-सी सहसा      
अंजुलि में मोती पाकर
अवाक रह जाऊँ तो.. ..!

फिर कभी यूँ ही
अनवरत यात्राओं की कड़ियाँ पिरोते
मैं हठी यात्री
चीन्ह कर तुम्हारी चुम्बकीय तरंग
उस छुअन से चमत्कृत-सी
फैंक दूँ सारी लदान और..... 
दिशाओं के चयन का द्वन्द्व तजकर
बढ़ चलूँ उस ओर जहाँ .…
निजता के लघुतम अणु का अन्तर्मेलन  
निर्विकल्प पा जाऊँ तो ....!

            कैलाश नीहारिका 






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