Wednesday, 4 September 2013

लहरों को लौट जाने दो

गुज़रते मौसमों  की तरह
आँधियों के वेगवान चक्रवातों को भी
गुज़र जाने दो

प्रतीक्षा एक बल है , संकल्प सौंपती है
सुझाते-सिखाते हुए
जीवन के रण-कौशल


अधूरे-से विषम समय में
सीखती हूँ अनमनी कभी
या कभी उत्साह से
श्रद्धा से प्राप्य  ग्रहण करने का कौशल भी !

लपकती लहरों का लौट जाना
सहज है , शाश्वत भी
डोर कैसे बाँध पाएगी उन्हें
लौट जाने दो
लहरों को, मौसमों को गुज़र जाने दो

                            कैलाश नीहारिका



2 Comments:

At 21 September 2013 at 03:42 , Blogger Prabhu Dayal Mishra said...

ठीक लगीं कवितायें । समय और शक्ति को चुनौती देती यह धारा शाश्वत का एक संकेत भी है ।
मिश्र प्रभु

 
At 29 September 2013 at 08:57 , Blogger कैलाश नीहारिका said...

धन्यवाद मिश्र जी ।

 

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