Monday, 1 April 2013

दूब उगा दूँ

                           
बार-बार चाहा
तुम्हारे सान्निध्य मे
नयनों से और रोम-रोम से
सारा खारापन उलीच दूँ
भारमुक्त श्वास जी उठें !

जाने कैसी धूल है यह
उड़ती है सतत 
थमने का नाम ही नहीं लेती
शायद कोई भीड़ चल रही है !
               
दूर खड़ी छिटककर मूँदे नयन
अवरुद्ध रोम छिद्रों से खिन्न
सभ्यता अकेली-सी !
                  
तुम कहो तो
आस-पास दूब उगा दूँ
और इक उपवन सौहार्द का 
धूल से, भीड़ से बचने के लिए !


                                     कैलाश नीहारिका