Wednesday, 20 March 2013

परतों से छनता रहस्य

बहुत देर तक
बहुत दूर तक
सितारे बने रहते हैं अकेले
अपनी चमक और उदासी ढोते हुए

फिर ...शिखर-आरोही होते -होते
सहसा
किन्हीं रहस्यमयी परतों  से
 झरते आलोक के स्पर्श से
 दिखता है उन्हें 
 गुरुत्वाकर्षण का रहस्य-बीज 
जिससे जुड़े हैं वे

उसी क्षण खुलते हैं 
कितने ही वातायन
उत्स की दिशा में !

                                 कैलाश नीहारिका

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