Wednesday, 11 May 2011

सभ्यता और आतंक

सभ्यता
 एक मासूम हठी औरत - सी
टहलना चाहे
किसी रोयेंदार
कुत्ते की जंजीर थामे
सडकों पर, मैदानों में
पर्वतों की तलहटिओं से शिखरों तक
 और चाहे  ढलानों पे उतरना
फिर स्वछन्द विचरना
जिजीविषा  से भरपूर तटों  पर
दूर तक !

पर, कुछ ही कदम चलकर
गुर्राते कुत्तों से घिरी
लुकती - छिपती, थर्राती वह
किसी खंडहर की ओट लेने को विवश -सी
अदृश्य होती बार-बार निर्विकल्प !

खंडहर में कुछ कबूतर हैं
अपनी गुटरगूँ में लीन
कुछ चमगादड़ हड़बड़ाते, पंख डुलाते
विकल, सुरक्षाहीन ,सहमे - सहमे
और बहुत -सी मकड़ियाँ
सदा सक्रिय ...भुतहे जाले बुनतीं !  

..अब सभ्यता क्या करे अपनी स्मृति का
सजग दृष्टि का !
उस दृष्टि में सुदूर मैदानों पर बिछी
अठखेलियाँ करती धूप है
पौधों को सहलाती हवा
और कोई टेर लिए झूमते पेड़-पत्ते !
वह दृष्टि दोहराती है
नेह भरे अपने  संकल्प
पर, कैसे दर्ज करे वह
गुर्राते खूँखार कुत्तों
और उनके आतंक के खिलाफ
उस प्रेम की गुहार
जो जोड़ता है सबको
 इतने महीन सूत्रों से
कि दिखते नहीं वे सूत्र
लेकिन टूटने पर
अशांत,असुरक्षित
चमगादड़-से विकल
हम अपने-अपने खँडहर में
असहज, असहाय-से
अन्तहीन  परिक्रमाबदध छटपटाते हैं ... ....

                                              कैलाश नीहारिका

                               ( भाषा  पत्रिका में प्रकाशित )






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